आइये जाने की —                     


…–वास्तु में काकिणि गणना का क्या महत्त्व और प्रभाव होता हैं ??                                                     
…– घरों के द्वार पर देहरी / स्टेप्स नहीं रखने के क्या प्रभाव (अच्छे-बुरे) और महत्त्व होंगें ??                     …–एक पल्ले के (एक तरफ खुलने वाले) दरवाजों के प्रचलन का क्या शुभ अशुभ प्रभाव होगा ??


उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर:—-


आइये जाने की क्या हैं काकिणि गणना और क्या हैं इसका महत्त्व ???


हमारे पूर्व आचार्यों, ऋषि-मुनियों ने गंभीर अध्ययन व अनुसंधान के द्वारा वास योग्य भूमि के विषय में उत्कृष्ट ज्ञान प्राप्त कर जनकल्याण की भावना से वास्तुशास्त्र विषय ज्ञानराशि को प्रदान किया है। इस संसार में मनुष्य या मनुष्येत्तर प्राणी अथवा कोई भी पदार्थ पंचतत्व के संयोग से ही बना है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु व आकाश, इन पांच तत्वों का मनुष्य के साथ अथवा उसके पर्यावरण के साथ गंभीर संबंध है। पंचतत्व की महत्ता के कारण ही प्रकृति में इसका विशिष्ट स्थान है। निवास स्थान में यदि पंचतत्वों को उचित स्थान दिया जाय तो मनुष्य प्रकृति के अनुरूप हो उसका आत्मीय हो सकता है, इसमें संदेह नहीं।
जिस गांव या नगर में हम बसने जा रहे हैं उसके पहले यह जान लेना आवश्यक है कि वह गांव या नगर वास्तु शास्त्र के अनुरूप प्रतिष्ठित है या नहीं। अर्थात उपयुक्त दिशा व उपयुक्त स्थानों में उस गांव में देव मंदिरों की स्थिति, विभिन्न जाति वर्णों के अनुसार वासव्यवस्था तथा जलाशय आदि की व्यवस्था वास्तु के अनुरूप है या नहीं। जो गांव वास्तुशास्त्र के अनुरूप है वहीं बसने के लिए भूमि का चयन करना चाहिए। इसके बाद वह गांव किसके लिए अनुकूल है और किसके लिए प्रतिकूल यह भी जान लेना चाहिए। निवासकर्ता की नाम राशि से गांव की राशि यदि ., 5, 9, .., ..वीं हो तो उत्तम तथा ., ., 4, 7वीं हो तो सम तथा 6, 8 व ..वीं हो तो निषिद्ध समझना चाहिए। इसी तरह काकिणी, नराकृति आदि विचारों के द्वारा भी शुभकारक गांव का चयन करना चाहिए।


.)”वास्तुराजवल्लभ” में
धन-ऋण कांकणी विचार की विस्तार से चर्चा की गई है
  इस के द्वारा किसी व्यक्ति विशेष के लिए कोई नगर या ग्राम शुभ या अशुभ रहेगा इसका विचार गडना द्वारा किया जाता है:


अंकस्य वामागति  – गणितीय सूत्रानुसार नाम-ग्राम,और ग्राम-नाम की स्थापना करे।उसमें आठ का भाग देकर शेष का फल विचार करते हैं। 
इन  सिद्धान्तों पर आर्ष वचन-
१) काकिण्यां वर्गशुद्धौ च वादे द्यूते स्वरोदये। 
मन्त्रे पुनर्भूवरणे नामराशेः प्रधानता।।(मु.चि.वा.प्र.)
२) साध्यवर्गं पुरः स्थाप्य साधकं पृष्ठतो न्यसेत्। 
      विभजेदष्टभिः शेषं साधकस्य धनं तथा।।
      व्यत्ययेनागतं शेषं साधकस्य ऋणं स्मृतम् । 
      धनाधिकं स्वल्पमृणं सर्वसम्पत्प्रदं स्मृतम्।। (वशिष्ठ)
३) गोसिंहनक्रमिथुनं निवसे न मध्ये।ग्रामस्य पूर्वककुभोऽलिझषाङनाश्च।
       कर्को धनुस्तुलभमेषघटाश्च तद्वद्।वर्गास्स्वपञ्चपरा बलिनः स्युरैन्द्र्याः।।
     (मु.चि.वा.प्र.)
४) स्फुटिता च सशल्याच वल्मीकाऽरोहिणी तथा।
दूरतः परिहर्तव्या कर्तुरायुर्धनापहा।।
      स्फुटिता मरणां कुर्यादूषरा धननाशिनी।
      सशल्या क्लेशदा नित्यं विषमा शत्रुवर्धनी।।  (वृहत्संहिता)
५) ग्रामादेरनुकूलत्वं दिशो भूतग्रहस्य च।
गृहधिष्ण्यादिकं शुद्धं वीक्ष्यायव्ययमंशकान्।।
सुगेहं रचयेद्धीमान्वास्तुशास्त्राऽनुसारतः।।  (वास्तुरत्नाकर-भू.परि.प्र.)
६) आदौ भूमिपरीक्षणं शुभदिने पश्चाच्च वास्त्वर्चनं,
भूमेः शोधनकं ततोऽपि विधिवत्पाषाणतोयान्तकम्।
पश्चाद्वेश्र्मसुरालयादिरचनार्थं पादसंस्थापनं
कार्यं लग्नशशाङ्कशाकुनबलैः श्रेष्ठे दिने धीमता।।(वास्तुराजवल्लभ-११-१४)।।


‘भविष्य पुराण’ में व्रतों और उपवासों के विस्तृत वर्णन के साथ-साथ मन्दिर निर्माण की प्रक्रिया का भी विस्तार से उल्लेख है। मन्दिरों के निर्माण में स्थापत्य कला का विशद वर्णन भी इस पुराण में प्राप्त होता है। 
‘भविष्य पुराण’ की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसका पारायण और रचना मग ब्राह्मणों द्वारा की गई है। ये मग ब्राह्मण ईरानी पुरोहित थे, जो ईसा की तीसरी शताब्दी में भारत आकर बस गए थे।


ये सूर्य के उपासक थे। सूर्य की उपासना वैदिक काल से भारत में होती रही है। मग ब्राह्मणों ने सूर्योपासना के साथ ‘खगोल विद्या’ और ‘ज्योतिष’ का प्रचलन किया।


सूर्य मन्दिर में सूर्य प्रतिमाओं के बारे में भी विस्तार से बताया गया है।
समाज की आर्थिक स्थिति के बारे में ‘भविष्य पुराण’ में अधिक जानकारी नहीं उपलब्ध होती। केवल कुछ प्रकार की मजदूरी का उल्लेख प्राप्त होता है। यदि पहले से मजदूरी तय न हो तो कुल किए गए काम का हिसाब लगाकर मजदूरी देनी चाहिए। साधारण तौर पर उस काल में मजदूरी ‘पण’ के रूप में दी जाती थी। बीस कौड़ी की एक काकिणी और चार काकिणी का एक पण होता था।


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जानिए धन-ऋण संबंधी कांकणी विचार—


इस सूत्र द्वारा भूमि चयन करने के लिए सर्वप्रथम उपर्युक्त द्वितीय विधि से अपने नाम और वांछित नगर के नाम का वर्ग जान लेना चाहिये।इसके बाद धन-ऋण का विचार करना चाहिये।
यथा- नागेश का नाम-वर्गांक हुआ- ५ एवं पटना का ग्राम वर्गांक हुआ- ६
अब इन दो अंकों से क्रमशः दो बार क्रिया करके धन-ऋण की जानकारी करेंगे।
यथा- १. (नाम × २ + ग्राम) ÷ ८ = नाम कांकणी
२. (ग्राम × २ + नाम) ÷ ८ = ग्राम कांकणी
अब, (नागेश- ५ × २ + पटना- ६) ÷ ८ = शेष . नाम कांकणी
(पटना- ६ × २ + नागेश- ५) ÷ ८ = शेष १ ग्राम कांकणी
यहाँ हम देखते हैं कि नाम की काकिणी कम है, ग्राम की कांकणी से।परिणाम यह होगा कि पटना नगर नागेश के लिये हमेशा आर्थिक दृष्टि से हानिकारक होगा। इसी सूत्र से विचार करने का एक और तरीका ऋषियों ने सुझाया है,जिसमें संख्यायें तो वे ही होंगी, किन्तु गणना भिन्न रीति से करना है।
अंकस्य वामागति – गणितीय सूत्रानुसार नाम-ग्राम,और ग्राम-नाम की स्थापना करे।पूर्व रीति से आठ का भाग देकर शेष का फल विचार करे।यथा-
नाम-ग्राम- ६५ ÷ ८ = शेष १ नाम काकिणी अथवा नाम ऋण
ग्राम-नाम- ५६ ÷ ८ = शेष ० ग्राम काकिणी अथवा नाम धन
इस तरह से धन-ऋण की अधिकता का विचार करेंगे।उपर के उदाहरण में नाम का धन ० है,और ऋण १ है।अतः नागेश के लिये पटना में रहना आर्थिक रूप से हानिकारक होगा।
उक्त दोनों उदाहरण मूलतः एक ही सूत्र की, अलग-अलग ऋषियों की व्याख्यायें हैं।अतः किसी संशय की बात नहीं।
भूमि-चयन-विचार में प्रयुक्त सिद्धान्तों पर आर्ष वचन-
१) काकिण्यां वर्गशुद्धौ च वादे द्यूते स्वरोदये।
मन्त्रे पुनर्भूवरणे नामराशेः प्रधानता।।(मु.चि.वा.प्र.)
२) साध्यवर्गं पुरः स्थाप्य साधकं पृष्ठतो न्यसेत्।
विभजेदष्टभिः शेषं साधकस्य धनं तथा।।
व्यत्ययेनागतं शेषं साधकस्य ऋणं स्मृतम् ।
धनाधिकं स्वल्पमृणं सर्वसम्पत्प्रदं स्मृतम्।। (वशिष्ठ)
३) गोसिंहनक्रमिथुनं निवसे न मध्ये।ग्रामस्य पूर्वककुभोऽलिझषाङनाश्च।
कर्को धनुस्तुलभमेषघटाश्च तद्वद्।वर्गास्स
्वपञ्चपरा बलिनः स्युरैन्द्र्याः।।
(मु.चि.वा.प्र.)
४) स्फुटिता च सशल्याच वल्मीकाऽरोहिणी तथा।
दूरतः परिहर्तव्या कर्तुरायुर्धनापहा।।
स्फुटिता मरणां कुर्यादूषरा धननाशिनी।
सशल्या क्लेशदा नित्यं विषमा शत्रुवर्धनी।। (वृहत्संहिता)
५) ग्रामादेरनुकूलत्वं दिशो भूतग्रहस्य च।
गृहधिष्ण्यादिकं शुद्धं वीक्ष्यायव्ययमं
शकान्।।
सुगेहं रचयेद्धीमान्वास्तुशास्त्राऽनुस
ारतः।। (वास्तुरत्नाकर-भू.परि.प्र.)
६) आदौ भूमिपरीक्षणं शुभदिने पश्चाच्च वास्त्वर्चनं,
भूमेः शोधनकं ततोऽपि विधिवत्पाषाणतोयान्तकम्।
पश्चाद्वेश्र्मसुरालयादिरचनार्थं पादसंस्थापनं
कार्यं लग्नशशाङ्कशाकुनबलैः श्रेष्ठे दिने धीमता।।(वास्तुराजवल्लभ-११-१४)
इस प्रकार आर्ष वचनानुसार, पहले भूमि की हर तरह से परीक्षा करे, फिर वास्तुपूजन करके विलकुल तह तक(जल निकलने तक)भूमि का शोधन करे।उसके बाद लग्न-चन्द्रादि शकुन बल विचार करके शुभ मुहूर्त में पाद-संस्थापन(layout) करना चाहिये।
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जानिए की कैसे करे काकिणी विचार या प्रयोग ???


अवर्ग, कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग, यवर्ग व शवर्ग ये आठ वर्ग हैं। यहां अवर्ग आदि गणना क्रम से वासकर्ता के नाम की संख्या जो हो उसे दो गुना कर गांव वर्ग संख्या को उसमें जोड़ दें और उसमें आठ का भाग देने पर जो शेष बचता है वह गांव की काकिणी होती है। इसके बाद वासकर्ता और गांव के काकिणी का अंतर करने पर जिसकी काकिणी अधिक बचती है वह अर्थदायक होता है।
नराकृतिचक्र विचार: —


यहां सर्वप्रथम एक नराकार ग्राम शुभाशुभ ज्ञानबोधक चक्र लिखना चाहिए। इसके पश्चात ग्राम नक्षत्र से व्यावहारिक नाम नक्षत्र तक गिने। अब नराकृति चक्र से मस्तक में पांच नक्षत्र लिखें। यहां यदि गृह स्वामी का नाम नक्षत्र हो तो वह ग्राम धनादि लाभकर होता है।


उसके बाद तीन नक्षत्र मुख में लिखें, मुख में नाम नक्षत्र के होने से वासकर्ता की धनहानि होती है। इसी तरह कुक्षि आदि में नक्षत्रों का न्यास कर फल का विचार करना चाहिए।


इस तरह वास्तुशास्त्रानुसार ग्राम का चयन कर उसमें किस दिशा में वास्तु का चयन करें, यह विचार करना चाहिए। जैसे गृहपति का नाम वर्गांक, ग्रामवर्गांक तथा दिशावर्गांक इन तीनों वर्गांकों का योग कर नौ से भाग देकर जो एक आदि शेष बचे उसका निम्प्रकार से उद्वेग आदि फल समझना चाहिए-


उद्विग्नचित्त:— परिपूर्णवित्तो वह्नयाभिभूतो ज्वरपीड़ितांग।
सौख्यान्वितो रोगयुत: सुखाढ्यो दु:खान्वित: सर्वसुखान्वितश्च।।


इसी तरह गृहदशादि का भी विचार कर उपयुक्त दिशा में प्रशस्त भूमि का चयन करना चाहिए। तात्पर्य यह है कि जिस भूमि में प्रशस्त औषधियां जैसे- जाया, जयंती, जीवन्ती, जीवपुत्र आदि हों, याज्ञिक वृक्ष जैसे – पलाश, पीपल आदि लगे हों, मधुर मिट्टी वाली भूमि, सुगन्धयुक्त, निर्मल,समान और छिद्ररहित भूमि निवास के लिए उत्तम होती है।


इसके बाद भूमि का अंत:परीक्षण भी करना चाहिए। इसके लिए गृहस्वामी के हाथ से एक हाथ लम्बी, चौड़ी व गहरी भूमि खोदकर उसे जल या मिट्टी से भरकर शुभाशुभ विचार निम्न प्रकार करना चाहिए।


जैसे ज्योतिर्निबन्धकार लिखते हैं-


स्मृत्वेष्टदेवतां प्रश्नवचनस्याद्यमक्षरम्।
गृहीत्वा तु तत: शल्याशल्यं समम्यग् विचार्यते।।
अ क च ट त प य श ह्पया: पूर्वादिमध्यान्ता:।
शल्यकरा इह नान्ये शल्यगृहे निवसतान्नश:।।


इसी तरह अहिबलचक्रादि के द्वारा भी भूमि का संशोधन कर उसका प्लवादि विचार भी करना चाहिए। प्लव विचार का मण्डल मण्डलेश आदि का विचार करना चाहिए।


यथा मण्डल विचार द्रष्टव्य है-


स्वामिहस्तप्रमाणेन दीर्घविस्तारसंयुतम्।
नवभिश्च हरेद्भागं शेषं मण्डलमुच्यते।।
दाता च भूपतिश्चैव क्लीवश्चौरो विचक्षण:।
षष्ठो भोगी धनाढ्यश्च दरिद्रो धनदस्तथा।।
मण्डलेश विचार द्रष्टव्य है-
स्वामिहस्तप्रमाणेन दीर्घविस्तारसंयुतम्।
द्विगुणं चाष्टभिर्भक्तं मण्लाधिप उच्यते।।
इन्द्रो विष्णुर्यमो वायु: कुबेरो धूर्जटिस्तथा।
विधाता विघ्नराजश्च मण्डलेशा: प्रीकीर्तिता:।
इन्द्र: सौख्यं यशो विष्णुर्यमो दु:खं निरंतरम्।।
वायुचोच्चाटनं कुर्यात् कुबेरो धनदो भवेत्।
धूर्जटि: कलहो नित्यं धाता सौख्यप्रवृद्धिदम्।
सर्वसिद्धं गणाधीश: फलमुक्तं मनीषिभि:।।
मण्डलादि विचार के पश्चात आंगणा विचार करना चाहिए- यथा
दीर्घविस्तरहस्तैक्यं वसुभिर्गुणितं तथा।
नवभिर्भाजिते शेषं वदेद्गेहांगणं सुधी:।।
तस्करभोगिविचक्षणदाता नृपतिर्नपुंसको धनद:।
दारिद्रयौ भयदाता नामसमाना: फलप्रदा: स्यु।।


यद्यपि आधुनिक युग में प्राय: लघु भूखंड में ही लोग भवन निर्माण करते हैं। उसमें भी खासकर मध्यमवर्ग के लोग तो लघु भूखंड का ही प्रयोग कर पाते हैं।


ऐसी स्थिति में उपर्युक्त व्यवस्था के अनुसार अलग-अलग काम की दृष्टि से अलग-अलग घरों का निर्माण करना प्राय: दुष्कर होता है। इस कारण उक्त विस्तृत गृह व्यवस्था का इस तरह संक्षेपीकरण किया जा सकता है।


जिससे मूल सिद्धान्त का अनुपालन भी हो जाए और लघु भूखंड का सदुपयोग भी। जैसे दधिमंथन गृह, घृत गृह, शास्त्रागार इत्यादि जो सामान्यतया आवश्यक नहीं है, उसे छोड़ा जा सकता है। इसी तरह रोदन गृह व रतिगृह की प्रासंगिता भी नहीं दिख रही है। रोदन गृह के स्थान पर अतिथि गृह का निर्माण किया जा सकता है।
इसके बाद स्नानागार और शौचालय विषय में आजकल की धारणा या परिस्थिति शास्त्रानुकूल नहीं देखी जा रही है, परन्तु इस विषय में ध्यातव्य है कि जहां तक हो सके शास्त्रीय विधि का ही पालन करना चाहिए। यदि वैसा सुविधाजनक न हो तो भवन के दक्षिण भाग में, पश्चिम भाग में अथवा वायव्य क्षेत्र में शौचालय व स्नानागार बनाया जा सकता है। परन्तु पूरब में नहीं बनाएं, यह उत्तम पक्ष है। यदि ऐसा भी संवभ न हो तो अग्निकोण में शौचालय का निर्माण कर उससे साक्षात् पूर्व स्नानगृह का समायोजन करना चाहिए, परन्तु नैर्ऋत्य और ईशान में ये दोनों कदापि न बनाएं।


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प्रश्न .. घरों के द्वार पर देहरी / स्टेप्स नहीं रखने के क्या प्रभाव (अच्छे-बुरे) और महत्त्व होंगें ??


उत्तर–


यह हैं देहरी का महत्त्व—


पुराने समय में द्वार हमेशा चौखट में लगायाजस्ता था याने नीचे भी लकड़ी की देहरी होती थी जो की ऋणात्मक ऊर्जा के साथ ही कीड़े मकोड़े,सांप बिच्छ को घर में प्रवेश करने से रोकती है। आज भी दक्षिण भारत के आधुनिक घरों में भी इसका चलन है।


केवल मुख्या द्वार दो पल्ले का होना चाहिए साथ ही अंदर के सभी दरवाजो की तुलना में बड़ा भी होना चाहिए बाकि अंदर के सभी द्वार एक पल्ले के और मुख्य द्वार से छोटा होना हितकर होता है।


और टॉयलेट के द्वार शयनकक्ष के द्वार से छोटा होना चाहिए लम्बाइ व् चौड़ाई दोनों में।


इतिहास गवाह है पृथ्वी लोक में ग्रहो के किसी भी प्रकार(सकारात्मक/नकारात्मक)के प्रभाव को भोगना ही होता है फिर चाहे सत् युग में शिवजी हो त्रेता युग में श्री राम हो या द्वापर युग में भगवन श्री कृष्ण।फिर तो यह कलयुग है और हम मनुष्य ।अतः ग्रहो के प्रभावों को स्वीकार करके कर्मो के प्रति सजक होकर सहज भाव से अपना … ℅ देते रहना चाहिए।बाकि सब प्रभु पर छोड़ देना ही हितकर होता है।

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प्रश्न .. -एक पल्ले के (एक तरफ खुलने वाले) दरवाजों के प्रचलन का क्या शुभ अशुभ प्रभाव होगा ??


किसी भी भवन में  मुख्य द्वार में . पल्लों का होना, एक पल्ले के होने से इसलिए भी बेहतर है की दो पल्लों के द्वार से प्रवेश हमेशा द्वार के मध्य से होता है जो की धनात्मक ऊर्जा का क्षेत्र है, जबकि एक पल्ले वाले द्वार में व्यक्ति अक्सर एक किनारे से प्रवेश करता है।


आधिकतम् प्राचीन ग्रंथो मे दो पल्ले के द्वार काही वर्णन है और ये विज्ञान परभी सिद्ध किया जा शकता है घर मे ऊर्जा प्रवेश सिहद्वार से हि होती है और वो ऊर्जा समप्रमाण मे घर मे विभाजित हो लेकिन एक पल्ले के द्वार मे इस प्रक्रिया मे ऊर्जा विभाजन मे न्यूनता आती है


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