दक्षिण मुखी/ दिशा से सम्बन्धित भवन —


ऐसा भूखण्ड जिसके दक्षिण में ही सड़क होतो उसे दक्षिण भूखण्ड कहते है। दक्षिणी मुखी भूखण्ड होने का प्रभाव घर की महिलाओ पर पड़ता है। दक्षिणी दिशा को सामान्य एवं अशुभ माना गया है। किन्तु सर्वथा ऐसा नहीं है। जिनकी जन्म कुण्डली मंे राहु प्रधान एवं शुक्र प्रधान कुण्डली होगी तो वह दक्षिण मुखी में खूब उन्नति करेगा। सोना चान्दी एवं सरार्फा की दुकान अगर दक्षिणी मुखी होगी तो दुकान खूब चलेगी। मगर इसमें कुण्डली बताये बगेर कभी भी दुकान एवं भवन नहीं लेना चाहिये।दक्षिण दिषा का कारक ग्रह मंगल है जो सदा ही मांगलिक कार्यों का प्रणेता रहा है। लाल रंगों से सुषोभित  यह ग्रह भूमि पुत्र भी कहलाता है। जन्मपत्रिका में मंगल की मजबूूत स्थिति निष्चित ही जातक को बड़ा व मजबूत मकान का योग प्रदान करती है। इस दिषा को यम की दिषा भी कहते है। 
दक्षिणी दिशा काल पुरूष का बाया सीना, किडनी, बाया फेफड़ा आते है। एवं कुण्डली का दशम घर है। कन्या, कक्र और मकर राशि वालो को दक्षिण मुखी भवन बनाना चाहिए।

/. दक्षिणाभिमुखी मकान में सड़क़ से सटा कर मकान बनाना चाहिये। अगर आगे जगह ज्यादा खुल्ली रख दी है तो धन नाश के अलावा महिलाओ की वजह से अस्पतालो में पैसा खर्च होगा।
/. दक्षिणाभिमुखी अगर कुण्डली में काम कर जाये तो अगर कुण्डली दक्षिणाभीमुखी बताती है तो दक्षिणाभिमुखी मकान गृहस्वामी को धन से मालामाल कर देती है। 
/.पीडि़त मंगल के व्यक्तियों को स्वयं के नाम का मकान नहीं बनाना चाहिए और विषेशकर दक्षिणमुखी तो हरगिज नहीं बनाए। दक्षिण दिषा में सामान्यतः षयनकक्ष, रसोईघर, सीढि़यां, स्टोर, भार युक्त सामग्री स्थल बनवाया जाता है जो षुभता लिए हुए परिणाम देता है परन्तु दक्षिण दिषा में तहखाना, ट्यूबवैल, सेप्टिक टैंक, भूमिगत जल स्टोरेज नहीं बनाया जाता । 
/. दक्षिण में बच्चो की पढ़ाई का कमरा होगा तो बच्चो की पढ़ाई में व्यवधान होगा।
/. अगर दक्षिण दिशा का फर्श नीचा होगा तो घर की मालकीन बीमार रहेगी।
/. दक्षिण में किसी भी प्रकार का खड्डा, नीचा स्थान, सेफ्टिक टेंक ज्यादा खुल्ला स्थान होने पर महिलाओ को असहाय रोग रहेगा।
/. दक्षिणाभिमुखी मकान का गेट अगर नैऋत्य की तरफ होगा तो घर में अकाल मृत्यु, आत्महत्या, शत्रुभय, धन्धे में घाटा एवं मालिक का दिमाग अस्थिर, चैरी का भय रहेगा।
/.षहर विषेशकर दक्षिण भाग में ही प्लाॅट लेकर भवन निर्माण करना भाग्यवर्धक है। क्यों कि प्रत्येक षहर का दक्षिण भाग अपेक्षाकृत समृद्ध लोगों के अधिकार क्षेत्र में आ जाता है या जिनका मंगल ग्रह षुभता लिए हुए हो तो उतना ही षुभ परिणाम वाला होता है। 
/. अगर दक्षिण दिशा में कहीं भी दरार पड़ गई होतो गृहस्वामी का समय उसी दिन से खराब हो जायेगा और धीरे-धीरे समय में परिवर्तन के साथ गृहस्वामी दुःखी होता जायेगा।
/. दक्षिणाभिमुखी गेट आग्नेय की तरफ होतो घर में आग लग जायेगी, चैरी हो सकती है। प्रथम संतान से वैमनस्य रह सकता है। /. दक्षिण में कुॅआ हो तो अर्थ-हानि अथवा दुर्घटना द्वारा मृत्यु सम्भव है।
/. दक्षिण भाग के मे दरवाजा आग्नेय मुखाभि हों तो चोर-भय, अग्नि-संबंधी विपदाएं एवं अदालती कार्यवाही के होने की संभावना है।
/. दक्षिणाभिमुखी मकान में सड़क़ से सटा कर मकान बनाना चाहिये। अगर आगे जगह ज्यादा खुल्ली रख दी है तो धन नाश के अलावा महिलाओ की वजह से अस्पतालो में पैसा खर्च होगा।
/.औद्योगिक इकाईयेां में भी दक्षिण दिषा में अग्नियुक्त यंत्र व भारी मषीनें रखना उपयुक्त है। खाली स्थान उत्तर की अपेक्षा कम होना अच्छा है तथा भूमितल उत्तर, पूर्व की अपेक्षा ऊंचा होना श्रेश्ठ है। भवन का निर्माण करवाते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि प्लाॅट का दक्षिणी दीवार मोटी, मजबूत व भारीपन लिए होना अच्छा परिणाम प्रदत्त होती है। छत का झुकाव, फर्षों का ढ़लान दक्षिण दिषा में नहीें करें। भवनों के  अन्दर का वास्तु भी इसी दिषा निर्देष पर आधारित है। यानि प्रत्येक कमरे में अपेक्षाकृत दक्षिण भाग भारी वस्तुओं के लिए निर्धारित है।
/. अगर नैऋत्य में गेट होगा तो मालिक कितना भी कमायेगा मगर धन कभी भी  संग्रह नहीं कर पायेगा और एक दिन ऐसा आयेगा कि वह दिवालिया हो जायेगाा।
/. कुछ लोगो का मानना है कि दक्षिण यम का है अतः कोशिश करनी चाहिये कि दक्षिण मुखी भूखण्ड कभी भी नहीं खरीदे। 
/. दक्षिण दीवार सबसे मोटी होनी चाहिये एवं 9. डिग्री कोण में होनी चाहिये। अगर ऐसा न हुआ तो गृहस्वामी को गृह भी त्याग कर परदेश गमन करना पड़ सकता है।
/. दक्षिण में कभी भी बरामदा एवं ज्यादा जालिया नहीं बनानी चाहिये।/. दक्षिणी फर्श तल उत्तरी फर्श तल से नीचा होने पर स्त्री रोग, धन हानि, अकाल मृृत्यु की आशंका रहती है एवं गृहस्वामी कर्जदार रहेगा।
/.सोते वक्त दक्षिण में सिर व उत्तर में पैर होना नैसर्गिकता की सुखद स्थिति को दर्षाता है। पानी की निकासी भी दक्षिण दिषा में वर्जित है। आवष्यकता होने पर दक्षिण पूर्वी भाग को इस व्यवस्था के लिए काम में लिया जा सकता है परन्तु दक्षिणी पष्चिमी भाग को इस कार्य के लिए निहायत ही वर्जित है। 
/. यदि मकान के दक्षिण में दरवाजा है, सामने दीवार है या मकान है तो यह स्थिती शुभ है। यदि दक्षिण के दरवाजे के सामने गड्ढा है, मैदान है या अंधेरा है तो गृहस्वामी भाई कष्टों का शिकार होंगे।
/. दक्षिण में सेफ्टिक टेंक, कुॅआ, अन्डर ग्राउन्ड, नीचापन होने पर पत्नी पति पर हावी रहती है। गृहस्वामी पत्नी के सामने भीगी बिल्ली की तरह रहेगा।
/. दक्षिण भाग सबसे ऊँचा होने पर हर जगह विजय होगी। गृहस्वामी कभी भी कर्जदार नहीं रहेगा। 
/. दक्षिण में पूजा स्थल होगी तो वह एक नाम मात्र की पूजा होगी। पूजा का फल कभी भी नहीं मिलेगा।
समाधान
.. मैंन गेट पर स्वास्तिक के चिन्ह लगाये।
.. दक्षिण दीवार पर बड़े पहाड़ की सिनहरी लगाये।
.. दक्षिण का मैंन गेट सुन्दर बनाये।
4. भैरव या हनुमान की उपासना करें।
5. दक्षिणावृति सूंड वाले गणपति द्वार के अन्दर-बाहर लगावें।



 पं. दयानन्द शास्त्री 
विनायक वास्तु एस्ट्रो शोध संस्थान ,  
पुराने पावर हाऊस के पास, कसेरा बाजार, 
झालरापाटन सिटी (राजस्थान) ..6…
मो. नं. . ;;9..4.9..67, 

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