वास्तुशास्त्रः सम्पूर्ण जानकारी – पण्डित दयानन्द शास्त्री


ये हें कुछ जरुरी वास्तु टिप्स –
आजकल के व्यस्त शहरी जीवन और तड़क-भड़क की जिन्दगी में हम नियमों को ताक में रखकर मनमाने ढंग से घर या मकान का निर्माण कर लेते हैं। जब भारी लागत लगाने के बावजूद भी घर के सदस्यों का सुख चैन गायब हो जाता है, तब हमें यह आभास होता है कि मकान बनाते समय कहां पर चूक हुई है। अतः मकान बनाने से पहले ही हम यहां पर कुछ वास्तु टिप्स दे रहे हैं, जिनका अनुशरण करके आप अपने घर-मकान, दुकान या कारखाने में आने वाली बाधाओं से मुक्ति पा सकते हैं ।हमारे रहन सहन में वास्तु शास्त्र का विशेष महत्व है। कई बार हम सभी प्रकार की उपलब्धियों के बावजूद अपने रोजमर्रा की सामान्य जीवन शैली में दुखी और खिन्न रहते हैं। वास्तु दोष मूलतः हमारे रहन सहन की प्रणाली से उत्पन्न होता है। प्राचीन काल में वास्तु शास्त्री ही मकान की बुनियाद रखने से पहले आमंत्रित किए जाते थे और उनकी सलाह पर ही घर के मुख्य द्वार रसोईघर, शयन कक्ष, अध्ययन शाला और पूजा गृह आदि का निर्णय लिया जाता था।
—-अपने घर में साल में एक दो-बार हवन करें|
—–घर में अधिक कबाड़ इकठ्ठा न करें|
—–शाम के समय एक बार पूरे घर की लाइट जरूर जलाएं|इस समय घर में लक्ष्मी का प्रवेश होता है|
—–सुबह-शाम सामूहिक आरती करें
—–महीने में एक या दो बार उपवास करें|
—–घर में हमेशा चन्दन और कपूर की खुशबु का प्रयोग करें|
—–जो व्यक्ति श्रेष्ट धन की इच्छा रखते हैं व रात्रि में सताईस हकिक पत्थर लेकर उसके ऊपर लक्ष्मी का चित्र स्थापित करें,तो निश्चय ही उसके घर में अधिक उन्नति होती है|
—–यदि ग्यारह हकिक पथेर लेकर किसी मंदिर में चदा दें|कहें की अमुक कार्य में विजय होना चाहता हूँ तो निश्चय ही उस कार्य में विजय प्राप्त होती है|
—-वास्तु में दिशाओं का बड़ा महत्व है इसलिए घर में कोई भी सामान रखने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि उस सामान को किस दिशा में रखा जाना चाहिए।
—-मकान के पूर्व/पूर्वोत्तर दिशा में छोटे झाड़ीनुमा पौधे लगाएं। इससे मकान में रहने वाले परिवार को सूर्य के विकिरण के लाभ अधिकतम मिलते हैं।
—स्टडी टेबल के पास पेंडुलम घड़ी लगाने से ज्यादा ध्यान लगता है।,सिर्फ वर्गाकार/आयताकार भूमि का टुकड़ा ही खरीदें।, कीचन में नीले रंग का प्रयोग न करें।, बेडरूम में पूजा का स्थान नहीं बनाएं।, मकान के —-प्रवेश द्वार के पास कोई कांटेदार पौधा न लगाएं।
—शयनकक्ष में झाडू न रखें। तेल का कनस्तर, अँगीठी आदि न रखें। व्यर्थ की चिंता बनी रहेगी। यदि कष्ट हो रहा है तो तकिए के नीचे लाल चंदन रख कर सोएँ।
—दुकान में मन नहीं लगता तो श्वेत गणपति की मूर्ति विधिवत पूजा करके मुख्य द्वार के आगे और पीछे स्थापित करना चाहिए।
—मुख्य दरवाजे के खोलने बंद करने में कोई आवाज नहीं होनी चाहिए।, खिड़कियां अधिकांशतः पूर्व/उत्तर की दीवारों पर बनानी चाहिए।
—घर में टूटा शीशा कतई न रहने दें।, किसी भी फ्लैट में उत्तर और पूर्व की ओर छूटा हुआ स्थान दक्षिण और पश्चिम में छूटे हुए स्थान से अधिक होना चाहिए।
–मकान पर किसी भी पेड़ की छाया नहीं गिरनी चाहिए।, भूमि का स्लोप पश्चिम से पूर्व या दक्षिण से उत्तर होनी चाहिए।
–उत्तर अथवा पूर्व में बड़ा खुला स्थान नाम, धन और प्रसिद्धि का माध्यम होता है। अपने मकान, फार्म हाउस कॉलोनी के पार्क फैक्टरी के उत्तर-पूर्व, पूर्व या उत्तरी भाग में शांत भाव से बैठना या नंगे पैर धीमे-धीमे टहलना सोया भाग्य जगा देता है।
—दक्षिण-पश्चिम में अधिक खुला स्थान घर के पुरूष सदस्यों के लिए अशुभ होता है, उद्योग धंधों में यह वित्तीय हानि और भागीदारों में झगड़े का कारण बनता है।
—घर या कारखाने का उत्तर-पूर्व (ईशान) भाग बंद होने पर ईश्वर के आशीर्वाद का प्रवाह उन स्थानों तक नहीं पहुंच पाता। इसके कारण परिवार में तनाव, झगड़े आदि पनपते हैं और परिजनों की उन्नति विशेषकर गृह स्वामी के बच्चों की उन्नति अवरूद्ध हो जाती है। ईशान में शौचालय या अग्नि स्थान होना वित्तीय हानि का प्रमुख कारण है ।
—सुबह जब उठते हैं तो शरीर के एक हिस्से में सबसे अधिक चुंबकीय और विद्युतीय शक्ति होती है, इसलिए शरीर के उस हिस्से का पृथ्वी से स्पर्श करा कर पंच तत्वों की शक्तियों को संतुलित किया जाता है।
—–बैठक के कमरे में द्वार के सामने की दीवार पर दो सूरजमुखी के या ट्यूलिप के फूलों का चित्र लगाएँ।
—–घर के बाहर के बगीचे में दक्षिण-पश्चिम के कोने को सदैव रोशन रखें।
—–घर के अंदर दरवाजे के सामने कचरे का ‍डिब्बा न रखें।
—–घर के किसी भी कोने में अथवा मध्य में जूते-चप्पल (मृत चर्म) न रखें।
—–जूतों के रखने का स्थान घर के प्रमुख व्यक्ति के कद का एक चौथाई हो, उदाहरण के तौर पर 6 फुट के व्यक्ति (घर का प्रमुख) के घर में जूते-चप्पल रखने का स्थल डेढ़ फुट से ऊँचा न हो।
—सबसे पहले उठकर हमें इस ब्रह्मांड के संचालक परमपिता परमेश्वर का कुछ पल ध्यान करना चाहिए। उसके बाद जो स्वर चल रहा है, उसी हिस्से की हथेली को देखें, कुछ देर तक चेहरे का उस हथेली से स्पर्श करें, उसे सहलाएं। उसके बाद जमीन पर आप उसी पैर को पहले रखें, जिसकी तरफ का स्वर चल रहा हो। इससे चेहरे पर चमक सदैव बनी रहेगी।
—व्यापार में आने वाली बाधाओं और किसी प्रकार के विवाद को निपटाने के लिए घर में क्रिस्टल बॉल एवं पवन घंटियां लटकाएं।
—घर में टूटे-फूटे बर्तन या टूटी खाट नहीं रखनी चाहिए। टूटे-फूटे बर्तन और टूटी खाट रखने से धन की हानि होती है।
—घर के वास्तुदोष को दूर करने के लिए उत्तर दिशा में धातु का कछुआ और श्रीयंत्र युक्त पिरामिड स्थापित करना चाहिए, इससे घर में सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है।
—तीन या तीन से अधिक दरवाजे एक सीध में नही होने चाहिए।
—-बीम के नीचे सिर करके न सोयें। पति पत्नि एक ही तकिए में सोयें।
—-घर के मुख्‍य द्वार के सामने शौचघर, बाथरुम नही होना चाहिए।
—-सीढ़ियाँ मुख्‍य द्वार के सामने या आस पास नहीं होनी चाहिए।
—-बीमारियों से बचाव के लिए उल्‍लू लॉकेट धारण करें।
—-वंश बढ़ाने के लिए कछुए के उपर कछुआ।
—-प्रगति के लिए चमत्‍कारी लक्‍की कार्ड…
—-भवन निर्माण में भारी धन खर्च करने के बावजूद भी सुख शांति नही।
—-भवन निर्माण के उत्तम भूमि चेक करवाएँ।
—-कक्षों के वास्‍तु के विपरीत स्थिति से आपके परिवार में कलह तो नहीं।
—-क्‍या आप बिना तोड़फोड़ किये भवन के वास्‍तु दोषों को दूर करना चाहते हैं।
—-क्‍या अपने शयन कक्ष और पूरे घर को फेंग शुई कराना चाहते हैं।
—-.4 घंटा मंत्र गुंजन यंत्र, इनमें गायत्री मंत्र, महामृत्‍युंजय मंत्र, गणपति मंत्र, ओम नम: शिवाय मंत्र तथा दस मंत्र का गुजन यंत्र। इनके गुंजन से घर में पवित्रता आती है तथा यह सुख शांति, समृद्धि का प्रतीक है।
—-मकान के पूर्व/पूर्वोत्तर दिशा में छोटे झाड़ीनुमा पौधे लगाएं। इससे मकान में रहने वाले परिवार को सूर्य के विकिरण के लाभ अधिकतम मिलते हैं।
—–ओवरहेड टंकी दक्षिण-पश्चिम दिशा में बनायी जानी चाहिए।
– —स्टडी टेबल के पास पेंडुलम घड़ी लगाने से ज्यादा ध्यान लगता है।
—-बेड के ठीक सामने मीटर नहीं लगाना चाहिए।
—–गर्भवती महिलाओं को दक्षिण पूर्व के कमरों में नहीं रहना चाहिए।
– —सिर्फ वर्गाकार/आयताकार भूमि का टुकड़ा ही खरीदें।
—-सभी कमरों के फर्नीचर पैटर्न को समय-समय पर बदलते भी रहें।
– —-कीचन में नीले रंग का प्रयोग न करें।
—-बेडरूम में पूजा का स्थान नहीं बनाएं।
—-घर की भीतरी दीवार बिना कवर किया हुआ स्टोन नहीं होना चाहिए।
—-स्टडी टेबल पर पानी का भरा गिलास रखने पर ध्यान अधिक लगता है।
– —मकान के प्रवेश द्वार के पास कोई कांटेदार पौधा न लगाएं।
—-सड़क के टी-प्वाइंट को फेस करते हुए मकान ठीक नहीं होते।
– –खिड़कियां अधिकांशतः पूर्व/उत्तर की दीवारों पर बनानी चाहिए।
– —मुख्य दरवाजे के खोलने बंद करने में कोई आवाज नहीं होनी चाहिए।
—-कीचन में, कुकिंग गैस और वाशिंग सिंक के बीच ज्यादा-से-ज्यादा दूरी होनी चाहिए।
—– पूजा उत्तर/पूर्व की ओर मुख करके करनी चाहिए।
—घर में टूटा शीशा कतई न रहने दें।
– —एक लाईन से तीन दरवाजे नहीं होने चाहिए।
—–सीढ़ियां क्लॉक वाईज बनी होनी चाहिए और प्रत्येक समूह में सीढ़ियों की संख्या विषम होनी चाहिए।
—–दरवाजों की संख्या सम-संख्या में जैसे .,4,6,8 आदि होनी चाहिए।
—–किसी भी फ्लैट में उत्तर और पूर्व की ओर छूटा हुआ स्थान दक्षिण और पश्चिम में छूटे हुए स्थान से अधिक होना चाहिए।
—-उत्तर-पूर्व, पूर्व और उत्तर दिशा में बड़े पेड़ नहीं बल्कि झाड़ी लगानी चाहिए।
—-मकान पर किसी भी पेड़ की छाया नहीं गिरनी चाहिए।
– —भूमि का स्लोप पश्चिम से पूर्व या दक्षिण से उत्तर होनी चाहिए।
—-घर के मुख्य द्वार पर शुभचिह्न अंकित करना चाहिए । इससे इस में सुख-समृद्धि बनी रहती है ।
—-घर में पूजा स्थल में एक जटा वाला नारियल रखना चाहिए ।
—-घर में सजावट में हाथी, रीछ, ऊँट को सजावटी खिलौने के रुप में उपयोग अशुभ होता है ।
—-ऐसे शयनकक्ष जिनमें दम्पत्ति सोते हैं, वहाँ हंसों के जोड़े अथवा सारस के जोड़े के चित्र लगाना अति शुभ माना गया है । ये चित्र शयनकर्त्ताओं के सामने रहे इस तरह लगाना चाहिए ।
—-घर के ईशान कोण पर कूड़ा-कर्कट भी इकठ्ठा न होने दें ।
—-घर में देव स्थल पर अस्त्र-शस्त्रों को रखना अशुभ है ।
— ईशान कोण यानि कि भवन का उत्तर-पूर्वी हिस्से वाला कॉर्नर पूजा स्थल होके पवित्रता का प्रतीक है, इसकिए यहाँ झाडू-पोचा, कुड़ादान नहीं रखना चाहिए ।
— प्रातःकाल नाश्ते से पूर्व घर में झाडू अवश्य लगानी चाहिए ।
— सन्ध्या समय जब दोनों समय मिलते हैं, घर में झाडू-पौंछे का काम नहीं करना चाहिए ।
— घर में जूतों का स्थान प्रवेश द्वार के दाहिने तरफ न रखें ।
— घर में टूटे दर्पण, टूटी टाँग का पाटा तथा किसी बन्द मशीन का रखा होना सुख समृद्धि की दृष्टि से अशुभ-कारक है ।
— घर में तलघर में परिवार के किसी भी सदस्यों के फोटो न लगाएँ तथा वहाँ भगवान् और देवी-देवताओं की तस्वीरें या मूर्तियाँ भी न रखें ।
— तीन व्यक्तियों का एक सीध में एकाकी फोटो हो, तो उसे घर में नहीं रखें और न ही ऐसे फोटो को कभी भी दीवार पर टाँगें ।
— अगर दीवार पर कोई फोटो लगाना हो, तो उसके नीचे एक लकड़ी की पट्टी लगाएँ अर्थात् वह फोटो लकड़ी के पट्टे पर टिके, दीवार पर नहीं ।
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ये हें व्यापार के लिए वास्तु टिप्स–
वास्तु शास्त्र के सिद्धांत सिर्फ घर पर ही नहीं बल्कि ऑफिस व दुकान पर भी लागू होते हैं। यदि दुकान या ऑफिस में वास्तु दोष हो तो व्यापार-व्यवसाय में सफलता नहीं मिलती। किस दिशा में बैठकर आप लेन-देन आदि कार्य करते हैं, इसका प्रभाव भी व्यापार में पड़ता है। यदि आप अपने व्यापार-व्यवसाय में सफलता पाना चाहते हैं नीचे लिखी वास्तु टिप्स का उपयोग करें-
वास्तु शास्त्रियों के अनुसार चुंबकीय उत्तर क्षेत्र कुबेर का स्थान माना जाता है जो कि धन वृद्धि के लिए शुभ है। यदि कोई व्यापारिक वार्ता, परामर्श, लेन-देन या कोई बड़ा सौदा करें तो मुख उत्तर की ओर रखें। इससे व्यापार में काफी लाभ होता है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी है कि इस ओर चुंबकीय तरंगे विद्यमान रहती हैं जिससे मस्तिष्क की कोशिकाएं सक्रिय रहती हैं और शुद्ध वायु के कारण भी अधिक ऑक्सीजन मिलती है जो मस्तिष्क को सक्रिय करके स्मरण शक्ति बढ़ाती हैं। सक्रियता और स्मरण शक्ति व्यापारिक उन्नति और कार्यों को सफल करते हैं। व्यापारियों के लिए चाहिए कि वे जहां तक हो सके व्यापार आदि में उत्तर दिशा की ओर मुख रखें तथा कैश बॉक्स और महत्वपूर्ण कागज चैक-बुक आदि दाहिनी ओर रखें। इन उपायों से धन लाभ तो होता ही है साथ ही समाज में मान-प्रतिष्ठा भी बढ़ती है।
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इन वास्तु टिप्स से होगा मानसिक तनाव दूर—
आजकल हर किसी की जिंदगी भागदौड़ से भरी है। हर कोई इस तरह अपने काम में लगा हुआ है कि मानसिक शांति तो बिल्कुल ही नहीं है। किसी के भी पास अपने आप के लिए वक्त ही नहीं है। अगर आप मानसिक तनाव से मुक्ति चाहते हैं तो नीचे लिखे वास्तु प्रयोग जरूर अपनाएं इनको अपनाने से आप खुद को सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर महसूस करेंगे।
– रात में झूठे बर्तन न रखें।
– संध्या समय पर खाना न खाएं और नही स्नान करें।
– शाम के समय घर में सुगंधित एवं पवित्र धुआ करें।
– दिन में एक बार चांदी के गिलास का पानी पीएं। इससे क्रोध पर नियंत्रण होता है।
– शयन कक्ष में मदिरापान नहीं करें। अन्यथा रोगी होने तथा डरावने सपनों का भय होता है।
– कंटीले पौधे घर में नहीं लगाएं।
– किचन में अग्रि और पानी साथ न रखें।
– अपने घर में चटकीले रंग नहीं कराये।
– घर में जाले न लगने दें, इससे मानसिक तनाव कम होता है।
– किचन का पत्थर काला नहीं रखें।
– भोजन रसोईघर में बैठकर ही करें।
– इन छोटे-छोटे उपायों से आप शांति का अनुभव करेंगे।
– घर में कोई रोगी हो तो एक कटोरी में केसर घोलकर उसके कमरे में रखे दें। वह जल्दी स्वस्थ हो जाएगा।
– घर में ऐसी व्यवस्था करें कि वातावरण सुगंधित रहे। सुगंधित वातावरण से मन प्रसन्न रहता है।
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इन वास्तु टिप्स से आप रहेंगे स्वस्थ—-
आपने वह कहावत तो सुनी ही होगी कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ दिमाग का निवास होता है। इसके लिए अपनी जीवन शैली में सुधार लाने के साथ-साथ अगर वास्तुशास्त्र के कुछ आधारभूत नियमों का भी खयाल रखा जाए तो परिवार में स्वास्थ्यप्रद वातावरण बना रहेगा :
.. सुबह उठकर पूर्व दिशा की सारी खिडकियां खोल दें। उगते सूरज की किरणें सेहत के लिए बहुत लाभदायक होती हैं। इससे पूरे घर के बैक्टीरिया एवं विषाणु नष्ट हो जाते हैं।
.. दोपहर बाद सूर्य की अल्ट्रावॉयलेट किरणों से निकलने वाली ऊर्जा तरंगें सेहत के लिए बहुत नुकसानदेह होती हैं। इनसे बचने के लिए सुबह ग्यारह बजे के बाद घर की दक्षिण दिशा स्थित खिडकियों और दरवाजों पर भारी पर्दे डाल कर रखें। क्योंकि ये किरणें त्वचा एवं कोशिकाओं को क्षति पहुंचाती हैं।
.. रात को सोते समय ध्यान दें कि आपका सिर कभी भी उत्तर एवं पैर दक्षिण दिशा में न हो अन्यथा सिरदर्द और अनिद्रा जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
4. गर्भवती स्त्रियों को दक्षिण-पश्चिम दिशा स्थित कमरे का इस्तेमाल करना चाहिए। ऐसी अवस्था में पूर्वोत्तर दिशा या ईशान कोण में बेडरूम नहीं रखना चाहिए। इसके कारण गर्भाशय संबंधी समस्याएं हो सकती हैं।
5. नवजात शिशुओं के लिए घर के पूर्व एवं पूर्वोत्तर के कमरे सर्वश्रेष्ठ होते हैं। सोते समय बच्चे का सिर पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।
6. हाई ब्लडप्रेशर के मरीजों को दक्षिण-पूर्व में बेडरूम नहीं बनाना चाहिए। यह दिशा अग्नि से प्रभावित होती है और यहां रहने से ब्लडप्रेशर बढ जाता है।
7. बेडरूम हमेशा खुला और हवादार होना चाहिए। ऐसा न होने पर व्यक्ति को मानसिक तनाव एवं नर्वस सिस्टम से संबंधित बीमारियां हो सकती हैं।
8. वास्तुशास्त्र की दृष्टि से दीवारों पर सीलन होना नकारात्मक स्थिति मानी जाती है। ऐसे स्थान पर लंबे समय तक रहने से श्वास एवं त्वचा संबंधी समस्याएं हो सकती हैं।
9. परिवार के बुजुर्ग सदस्यों को हमेशा नैऋत्य कोण अर्थात दक्षिण-पश्चिम दिशा में स्थित कमरे में रहना चाहिए। यहां रहने से उनका तन-मन स्वस्थ रहता है।
… किचन में अपने कुकिंग रेंज अथवा गैस स्टोव को इस प्रकार व्यवस्थित करें कि खाना बनाते वक्त आपका मुख पूर्व दिशा की ओर रहे। यदि खाना बनाते समय गृहिणी का मुख उत्तर दिशा में हो तो वह सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस एवं थायरॉइड से प्रभावित हो सकती है। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके भोजन बनाने से बचें। गृहिणी के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य पर इसका नकारात्मक प्रभाव पडता है। इसी तरह पश्चिम दिशा में मुख करके खाना बनाने से आंख, नाक, कान एवं गले से संबंधित समस्याएं हो सकती हैं।
… यह ध्यान रखें कि रात को सोते हुए बेड के बिलकुल पास मोबाइल, स्टेवलाइजर, कंप्यूटर या टीवी आदि न हो। अन्यथा इनसे निकलने वाली विद्युत-चुंबकीय तरंगें मस्तिष्क, रक्त एवं हृदय संबंधी रोगों का कारण बन सकती हैं।
… बेडरूम में पुरानी और बेकार वस्तुओं का संग्रह न करें। इससे वातावरण में नकारात्मकता आती है। साथ ही, ऐसे चीजों से टायफॉयड और मलेरिया जैसी बीमारियों के वायरस भी जन्म लेते हैं।
… आंखों की दृष्टि मजबूत बनाने के लिए सुबह जल्दी उठकर, किसी खुले पार्क या हरे-भरे बाग बगीचे में टहलें। वहां मिलने वाला शुद्ध ऑक्सीजन शरीर की सभी ज्ञानेंद्रियों को स्वस्थ बनाए रखने में सहायक होता है।
.4. कोशिश होनी चाहिए कि भोजन करते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर दिशा में रहे। इससे सेहत अच्छी बनी रहती है। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके भोजन करने से पाचन तंत्र से संबंधित बीमारियां हो सकती हैं।
.5. टीवी देखते हुए खाने की आदत ठीक नहीं है। ऐसा करने पर मन-मस्तिष्क भोजन पर केंद्रित न होकर माहौल के साथ भटकने लगता है। इससे शरीर को संतुलित मात्रा में भोजन नहीं मिल पाता। साथ ही टीवी से निकलने वाली नकारात्मक ऊर्जा का स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पडता है।
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किराये के घर में ऐसे करें वास्तु दोष दूर/निवारण–
घर में वास्तु दोष होने पर परिवार के सदस्यों को आर्थिक,शारीरिक और मानसिक परेशानियाँ उठानी पड़ती हैं|इन सभीपरेशानियों से बचने के लिए जरूरी है की हमारे घर के सभी वास्तुदोष दूर किये जायें या उन्हें सुधारा जाये|यदि आपकिराये के मकान में रहते हैं और वहां कोई वास्तु दोष है तो आप घर में बिना कोई तोड़ फोड़ किये उन दोषों को दूर करसकते हैं|कुछ बातों का ध्यान रखा जाये तो किराये के घर में भी वास्तु दोष से छुटकारा पाया जा सकता है|जैसे-
भवन का उत्तर-पूर्व का भाग अधिक खाली रखें|
दक्षिण-पश्चिम दिशा के भाग में अधिक भार या समान रखें|
पानी की सप्लाई उत्तर-पूर्व से लें|
शयनकक्ष में पलंग का सिरहाना दक्षिण दिशा में रखें और सोते समय सिर दक्षिण दिशा में वे पैर उत्तर दिशा में रखें|यदि ऐसा न हो तो पश्चिम दिशा में सिरहाना व सिर कर सकते हैं|
भोजन दक्षिण-पूर्व की और मुख करके ग्रहण करें|
पूजास्थल उत्तर-पूर्व दिशा में स्थापित करें यदि अन्यदिशा में हो तो पानी ग्रहण करते समय मुख ईशान(उत्तर-पूर्व)कोण की और रखें|
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किचन के लिए वास्तु टिप्स—–
महिलाओं का अधिकतम समय किचन में ही बीतता है। वास्तुशास्त्रियों के मुताबिक यदि वास्तु सही न हो तो उसका विपरीत प्रभाव महिला पर, घर पर भी पड़ता है। किचन बनवाते समय इन बातों पर गौर करें।
—किचन की ऊँचाई .. से .. फीट होनी चाहिए और गर्म हवा निकलने के लिए वेंटीलेटर होना चाहिए। यदि 4-5 फीट में किचन की ऊँचाई हो तो महिलाओं के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। कभी भी किचन से लगा हुआ कोई जल स्त्रोत नहीं होना चाहिए। किचन के बाजू में बोर, कुआँ, बाथरूम बनवाना अवाइड करें, सिर्फ वाशिंग स्पेस दे सकते हैं।
—किचन में सूर्य की रोशनी सबसे ज्यादा आए। इस बात का हमेशा ध्यान रखें। किचन की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें, क्योंकि इससे सकारात्मक व पॉजिटिव एनर्जी आती है।
—- किचन हमेशा दक्षिण-पूर्व कोना जिसे अग्निकोण (आग्नेय) कहते है, में ही बनवाना चाहिए। यदि इस कोण में किचन बनाना संभव न हो तो उत्तर-पश्चिम कोण जिसे वायव्य कोण भी कहते हैं पर बनवा सकते हैं।
—- किचन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा प्लेटफार्म हमेशा पूर्व में होना चाहिए और ईशान कोण में सिंक व अग्नि कोण चूल्हा लगाना चाहिए।
—- किचन के दक्षिण में कभी भी कोई दरवाजा या खिड़की नहीं होने चाहिए। खिड़की पूर्व की ओर में ही रखें।
—- रंग का चयन करते समय भी विशेष ध्यान रखें। महिलाओं की कुंडली के आधार पर रंग का चयन करना चाहिए।
—- किचन में कभी भी ग्रेनाइट का फ्लोर या प्लेटफार्म नहीं बनवाना चाहिए और न ही मीरर जैसी कोई चीज होनी चाहिए, क्योंकि इससे विपरित प्रभाव पड़ता है और घर में कलह की स्थिति बढ़ती है।
— किचन में लॉफ्ट, अलमारी दक्षिण या पश्चिम दीवार में ही होना चाहिए।
— पानी फिल्टर ईशान कोण में लगाएँ।
—- किचन में कोई भी पावर प्वाइंट जैसे मिक्सर, ग्रांडर, माइक्रोवेव, ओवन को प्लेटफार्म में दक्षिण की तरफ लगाना चाहिए। फ्रिज हमेशा वायव्य कोण में रखें।
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पूजा घर के लिए वास्तु टिप्स—-
घर में अन्य इन्टीरियर के अलावा पूजा घर या पूजा स्थल का भी अपना महत्व होता है। इसकी दिशा-दशा का ध्यान रखना अति आवश्यक है। विशेषज्ञों के अनुसार पूजा रूम के लिए घर का उत्तर-पूर्व कोना अच्छा होता है। क्योंकि यह ईशान अर्थात् ईश्वर का स्थान होता है। दक्षिण में तो पूजा रूम कतई नहीं होना चाहिए।
– किसी भी मूर्ति को पूजा रूम के पूर्व या पश्चिम में रखना चाहिए। इसे उत्तर या दक्षिण दिशा की ओर नहीं रखना चाहिए जिससे की पूजा करते समय मुंह पूर्व या पश्चिम की ओर रहे।
– घर के पूजा रूम में रखी जाने वाली मूर्तियों का आकार तीन इंच से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
– मूर्तियों या तस्वीरों को आमने सामने नहीं रखना चाहिए। मूर्ति यदि टूटी फूटी हो या उसमें किसी प्रकार की दरार हो तो उन्हें पूजा घर में ना रखें।
– मूर्तियां संगमरमर या लकड़ी की अच्छी होती है तथा मूर्तियां रखने के लिए प्लेटफार्म लकड़ी की सबसे अच्छी होती है।
-दीवारों के रंग के लिए सफेद, क्रीम या हल्के नीले रंग का प्रयोग करना चाहिए।
– रसोईघर तथा बाथरूम के साथ लगे पूजा घर नहीं बनवाएं।
– पूजा रूम घर के अंदर ग्राउंड फ्लोर पर सही होता है। बेसमेंट या पहली मंजिल पर नहीं।
– देवी-देवताओं की मूर्तियों या तस्वीरों में उनका चेहरा साफ-साफ नजर आना चाहिए। फूल माला आदि किसी भी चीज से चेहरा ढका नहीं होना चाहिए।
-यदि छोटा घर हो तो पूजा की जगह बच्चों के बेडरूम में उत्तर पूर्व कोने में बनवायें।
– पूजारूम का दरवाजा लकड़ी का ही होना चाहिए। और खिड़की पूर्व या उत्तर दिशा में बनवायें।
-पूजा रूम में चीजें रखने की आलमारी की जगह पश्चिम या दक्षिण में ही निर्धारित करें।
– पूजा रूम से हटाया गया कोई भी सामान चाहे वह मूर्ति हो या फूल घर के किसी और जगह पर ना रखें। ऐसी वस्तुओं को किसी नदी में प्रवाहित कर देना शुभ होता है।
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इन वास्तु टिप्स से आएगी घर में सुख-शांति —
.. मकान का मुख्‍य द्वार दक्षिण मुखी नहीं होना चाहिए। इसके लिए आप चुंबकीय कंपास लेकर जाएं। यदि आपके पास अन्‍य विकल्प नहीं हैं, तो द्वार के ठीक सामने बड़ा सा दर्पण लगाएं, ताकि नकारात्‍मक ऊर्जा द्वार से ही वापस लौट जाएं।
.. घर के प्रवेश द्वार पर स्वस्तिक या ऊँ की आकृति लगाएं। इससे परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
.. घर की पूर्वोत्‍तर दिशा में पानी का कलश रखें। इससे घर में समृद्धि आती है।
4. घर के खिड़की दरवाजे इस प्रकार होनी चाहिए, कि सूर्य का प्रकाश ज्‍यादा से ज्‍यादा समय के लिए घर के अंदर आए। इससे घर की बीमारियां दूर भागती हैं।
5. परिवार में लड़ाई-झगड़ों से बचने के लिए ड्रॉइंग रूम यानी बैठक में फूलों का गुलदस्‍ता लगाएं।
6. रसोई घर में पूजा की अल्‍मारी या मंदिर नहीं रखना चाहिए।
7. बेडरूम में भगवान के कैलेंडर या तस्‍वीरें या फिर धार्मिक आस्‍था से जुड़ी वस्‍तुएं नहीं रखनी चाहिए। बेडरूम की दीवारों पर पोस्‍टर या तस्‍वीरें नहीं लगाएं तो अच्‍छा है। हां अगर आपका बहुत मन है, तो प्राकृतिक सौंदर्य दर्शाने वाली तस्‍वीर लगाएं। इससे मन को शांति मिलती है, पति-पत्‍नी में झगड़े नहीं होते।
8. घर में शौचालय के बगल में देवस्‍थान नहीं होना चाहिए।
9. घर में घुसते ही शौचालय नहीं होना चाहिए।
… घर के मुखिया का बेडरूम दक्षिण-पश्चिम दिशा में अच्‍छा माना जाता है।
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ये हें ड्राईंग रूम के लिए वास्तु टिप्स—
ड्राईंग रूम हमारी सौन्दर्यात्मक अभिरूचि और स्टेटस का प्रतीक है। आज की जीवनशैली में ड्राईंग रूम का महत्व बहुत है। आजकल अधिकतर हम ड्राईंग रूम में ही टीवी रखते और देखते हैं। भोजन करते हुए टीवी देखने की प्रवृत्ति भी बढ़ गई है, जबकि जानकारों का कहना है कि ऐसा करना अच्छा नहीं है। इस रूम में ही बैठकर हम मेहमानों के साथ या आपस में वार्ता करते हैं और जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय लेते हैं। लाजिमी है कि वास्तु की दृष्टि से ड्राईंग रूम का विशेष महत्व है। इस कमरे में हम दूसरे किसी भी कमरे की तुलना में ज्यादा तरह के छोटे-बड़े सामान रखते हैं। किस सामान को कहां और कैसे रखा जाए, खूबसूरती के नजरिए से इसका महत्व तो है ही, वास्तु के नजरिए से भी है। भारतीय परम्परा में सौंदर्यात्मक मानकों की वास्तु के मानकों से समानता है। ड्राईंग रूम के लिए नीचे दिए गए टिप्स पर ध्यान दें—
.. ड्राईंग रूम को पूरे मकान के उत्तर-पूर्व कोण में रखना सबसे आदर्श स्थिति है। वास्तु की शब्दावली में इसे ईशान कोण कहते हैं। पश्चिम की ओर या दक्षिण की ओर दिशा वाले मकान में ऐसा करना संभव नहीं होगा, तो उसके लिए विशेषज्ञ वास्तुकार की सलाह लें। विशेषज्ञ अन्य कमरों के बारे में आपकी योजना के साथ तुलना करते हुए ड्राईंग रूम की अपेक्षित स्थिति बताएगा।
.. कमरे में सोफे और कुर्सियों को जमाने की व्यवस्था इस प्रकार करनी चाहिए कि मकान का मालिक जब बैठे तो उसका मुख पूर्व या उत्तर की ओर हो और अन्य लोग उसकी ओर मुख करके बैठें। इससे ईशान कोण और उत्तर पूर्व कोण से आने वाली उर्जा तरंगों का अधिकतम लाभ मिलेगा, विशेषकर महत्वपूर्ण नीति-निर्णयों के मामले में।
.. अगर लम्बे सोफे को पूर्व की ओर मुख करके रखा गया है, तो मालिक इसके दक्षिण पश्चिम कोण में बैठे। अगर दोनों छोटे सोफों को पूर्व की ओर मुख करके रखा गया है, उस स्थिति में भी मालिक दक्षिण पश्चिम कोने वाले सोफे पर बैठे। इन कोण को वास्तु की शब्दावली में नैरूठी कोण कहते हैं।
4. टेलीफोन को नैरूठी कोण में ही मालिक की सीधी पहुंच में रखना चाहिए।
5. ड्राईंग रूम अगर ईशान कोण में हो, और ड्राईंग रूम की फ्लोरिंग अगर शेष मकान से नीचे हो तो यह सबसे अधिक आदर्श स्थिति है।
6. पूर्व और उत्तार दिशा वाले मकान के लिए तो यह अच्छा है कि प्रवेश द्वार से घुसते ही पहला कमरा ड्राईंग रूम हो, पर दक्षिण और पश्चिम रूख वाले मकान के लिए ऐसा अच्छा नहीं है। ऐसे लोग वास्तु विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।
7. ड्राईंग रूम में प्रवेश के दरवाजे आमतौर पर कोनों में ही होने चाहिएं। ड्राईंग रूम में प्रवेश के और इस कमरे से अन्य कमरों में प्रवेश के दरवाजे कितने और कहां-कहां रखे जाएं, इस बारे में वास्तु-विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें। वास्तु में दरवाजों की स्थिति का विशेष महत्व है।
8. ड्राईंग रूम के सभी हिस्सों और सभी दीवारों की सजावट में परिवार के सभी सदस्यों के व्यक्तित्व और अभिरूचि का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। सजावट की सभी वस्तुओं के बीच एक सौंदर्यात्मक अन्विति होनी चाहिए।
क्या हें वास्तुशास्त्र की सार्थकता ,उपयोगिता एवं प्रासंगिकता ?
वास्तुशास्त्र भारत का अत्यन्त प्राचीन शास्त्र है। वैदिक काल में इसे स्थापत्यवेद की संज्ञा दी गयी। वेदों के प्रति हमारी श्रध्दा और विश्वास आज भी उतने ही दृढ़ हैं जितने पहले थे किन्तु वर्तमान में इस शास्त्र क प्रति संदेह व्यक्त किये जाते हैं जबकि स्थान-स्थान पर खुदाई में प्राप्त प्राचीन बस्तियों के भग्नावेश इस बात के साक्षी हैं कि प्राचीन समय में मंदिर, प्रासाद, बस्तियों एवं नगरों का निर्माण वास्तुशास्त्र के सिध्दांतों के अनुसार ही होता था और इसी कारण लोग अपेक्षाकृत अधिक सुखी थे।
मानव सभ्यता के विकास एवं विज्ञान की उन्नति के साथ भवन निर्माण कला में अनेकानेक परिवर्तन होते गये। जनसंख्या में द्रूतगति से होती वृध्दि और भूखण्डों की सीमित संख्या जनसामान्य की अशिक्षा और वास्तुग्रंथों के संस्कृत में लिखे होने एवं मुद्रण प्रणाली के विकसित न होने के कारण इस शास्त्र की उत्तरोत्तर अवहेलना होगी गयी। विदेशी शासकों के बार-बार हुए आक्रमणों एवं अंग्रेजों के भारत में आगमन के पश्चात् पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण में हम अपने समृध्द ज्ञान के भंडार पर पूर्णरूप से अविश्वास कर इसे कपोल कल्पित, भ्रामक एवं अंधविश्वास समझने लगे।प्रकृति की ऊर्जा शक्तियों के संतुलित उपयोग से जीवन को खुशहाल और समृद्धिदायक कैसे बनायें? इसका व्यवस्थित अध्ययन और व्यावहारिक उपयोग करना ही वास्तु विज्ञान है।
वास्तु के सिद्धांतों का परिपालन करके बनाये गये मकान में रहने वाले प्राणी सुख, शांति, स्वास्थ्य, समृद्धि इत्यादि प्राप्त करते हैं। जबकि वास्तु के सिद्धांतों के विपरीत बनाये गये मकान में रहने वाले देर-सवेर इन्हीं बातों के प्रति प्रतिकूलता का अनुभव करते हैं एवं कष्टपद जीवन व्यतीत करते हैं। कई सज्जनों के मन में यह शंका होती है कि वास्तु विषय का अधिकतम उपयोग आर्थिक दृष्टि से संपन्न वर्ग ही करते हैं। मध्यम वर्ग के लिये इस विषय का उपयोग कम होता है। निस्संदेह यह धारणा गलत है। वास्तु विषय किसी वर्ग या जाति विशेष के लिये ही नहीं है, बल्कि वास्तु विज्ञान संपूर्ण मानव जाति के लिये प्रकृति की ऊर्जा शक्तियों का एक अनुपम वरदान है।जिस प्रकार सूर्य की किरणें अमीर-गरीब एवं किसी जाति विशेष का भेदभाव किये बिना सभी को समान रूप से प्रभावित करती है, उसी प्रकार वास्तु के पंच तत्वों का उचित संतुलन सभी को बिना किसी भेदभाव के समान रूप से प्रभावित करता हैं। यह व्यक्ति की स्वयं की इच्छा शक्ति की योग्यता पर निर्भर करता है कि वास्तु विज्ञान के इस अनमोल खजाने से वह कितना ज्ञान ग्रहण करके इसके उपयोग से लाभान्वित हो सकता है।
किन्तु अब जब से विदेशों में हमारे इस शास्त्र को मान्यता प्राप्त हुआ है। जर्मनी, अमेरिका, चीन, जापान आदि देशों में इन ग्रंथों के अनुवाद और सिध्दांतों का अनुपालन आरम्भ हुआ है तो हमने भी इस ओर ध्यान दिया है। किन्तु किसी भी विद्या को पूर्ण और विज्ञान मानने से पूर्व उसे विज्ञान के अनिवार्य पांच तत्वों की कसौटी पर परखना आवश्यक है। ये तत्व है तर्क संगतता और सिध्दान्तता, साध्यता, स्थायित्व, उपयोगिता एवं सर्वग्राह्यता। क्या वास्तु विद्या इस कसौटी पर खरी उतरती है? आइये परखें।भारत के अलावा कई पश्चिमी देशों में भूमि पूजन या नींव पूजन आदि नहीं कराये जाते तब भी वहां सब ठीक रहता है.’ वास्‍तु विषय के मुताबिक पूजन कराना अनिवार्य शर्त नहीं बल्कि एक सुविधा है। यानि अगर पूजन नहीं भी कराया है तो उस घर में सुखी और समृद्ध बनकर रहा जा सकता है। लेकिन अब भी वास्‍तु के नियम वही रहेंगे।
वास्तु कला का सीधा सम्बन्ध प्राचीन शिल्पशास्त्रिय कला से है | प्राचीन शिल्प-शास्त्रियों ने भवन निर्माण कला, वास-वसति-विज्ञानं के सम्बन्ध में ही वास्तु शब्द को लक्षित किया था | वास्तु शब्द का लक्षण, धरा (भूमि), हमर्ययाँ एवं पर्यक से भी है | इन्ही से नागरिक शास्त्र का प्रादुर्भाव हुआ | संभवतया वास्तु का सम्बन्ध पहले राष्ट्र से, फिर नगर से , ग्राम से, तत्पश्चात स्थान विशेष से है अतः गाँव बसेगा तो नगर बसेगा, गाँव बसेगा तो मानव बसेगा | घरों, भवनों आदि के निर्माण योग्य स्थान का ही दूसरा नाम नगर है इसलिए नगर-निवेश (योजना) वास्तुशास्त्र का सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं प्रमुख अंग है साथ ही प्रधान विषय भी है |
वास्तुविद्या में भवन पर सूर्य रश्मियों का वही प्रभाव डालने का प्रयास है जो सूर्य रश्मियों का इस पृथ्वी पर है। पृथ्वी अपनी धुरी पर पूर्व की ओर …5. डिग्री झुकी हुई है। इस कारण उसका उत्तर भाग, ईशान और पूर्वी भाग पूर्व की ओर झुक गये हैं दक्षिण, नैऋत्य एवं पश्चिम भाग कुछ ऊंचे उठ गये हैं। भवन निर्माण में इसी सिध्दांत के अनुसार भूखण्ड और ढलान पूर्व, उत्तर एवं ईशान और होना तथा भूखण्ड का दक्षिणी भाग, नैऋत्य तथा पश्चिमी भाग ऊंचा होना निर्दिष्ट है। अनुभव से ही यही बात सिध्द होती है कि भवन दक्षिण पश्चिम में ऊंचे तथा ऊंचाई पर निर्मित होते हैं तथा जिनका ढलान पूर्व, उत्तर एवं ईशान की ओर होता है अर्थात् जिनक, प्रयोग लाया गया जल एवं वर्षा का जल ईशान कोण से अथवा पूर्व उत्तर की ओर से बहकर बाहर निकलता हो वहां के निवासी आरोग्य, समृध्दि एवं पारिवारिक शांति का अनुभव करते हैं तथा इससे विपरीत दिशा वालें संकट और विघ्नों से घिरे रहते हैं।
वास्तुशास्त्र को लेकर हर प्रकार से प्रयोग किया जा सकता है। भूखण्ड एवं भवन के दोषपूर्ण होने पर उसे उचित प्रकार से वास्तुनुसार साध्य बनाया जा सकता है। हमने अपने अनुभव से जाना है कि जिन घरों के दक्षिण में कुआं पाया गया उन घरों की गृहस्वामिनी का असामयिक निधन आकस्मिक रूप से हो गया तथा घर की बहुएं चिरकालीन बीमारी से पीड़ित मिली। जिन घरों या औद्योगिक संस्थानों ने नैऋत्य में बोरिंग या कुआं पाया गया वहां निरन्तर धन नाश होता रहा, वे राजा से रंक बन गये, सुख समृध्दि वहां से कोसों दूर रही, औद्योगिक संस्थानों पर ताले पड़ गये। जिन घरों या संस्थानों के ईशान कोण कटे अथवा भग्न मिले वहां तो संकट ही संकट पाया गया। यहां तक कि उस गृहस्वामी अथवा उद्योगपति की संतान तक विकलांग पायी गयी। जिन घरों के ईशान में रसोई पायी गयी उन दम्पत्तियों के यहां कन्याओं को जन्म अधिक मिला या फिर वे गृह कलह से त्रस्त मिले। जिन घरों में पश्चिम तल नीचा होता है तथा पश्चिमी नैऋत्य में मुख्य द्वार होती है, उनके पुत्र मेधावी होने पर भी निकम्मे तथा उल्टी-सीधी बातों में लिप्त मिले हैं।किसी भी स्‍थान की अवस्‍था को वास्‍तु कहा जा सकता है। स्‍थान की अवस्‍था का आकलन करने के लिए यह देखा जाएगा कि वह कहां स्थित है, हवा, पानी, रोशनी आदि की कैसी व्‍यवस्‍था है, घर के बाहर के क्‍या हालात हैं आदि। यह तो हुई स्‍थान की इंडिपेंडेंट बात। अब उस स्‍थान के मालिक और स्‍थान में भी एक संबंध होता है। यही संबंध तय स्‍थान पर हुए निर्माण में दृष्टिगोचर होता है।
वास्तु का प्रभाव चिरस्थायी है, क्योंकि पृथ्वी का यह झुकाव शाश्वत है, ब्रह्माण्ड में ग्रहों आदि की चुम्बकीय शक्तियों के आधारभूत सिध्दांत पर यह निर्भर है और सारे विश्व में व्याप्त है इसलिए वास्तुशास्त्र के नियम भी शाश्वत है, सिध्दांत आधारित, विश्वव्यापी एवं सर्वग्राहा हैं। किसी भी विज्ञान के लिए अनिवार्य सभी गुण तर्क संगतता, साध्यता, स्थायित्व, सिध्दांत परकता एवं लाभदायकता वास्तु के स्थायी गुण हैं। अतः वास्तु को हम बेहिचक वास्तु विज्ञान कह सकते हैं।
जैसे आरोग्यशास्त्र के नियमों का विधिवत् पालन करके मनुष्य सदैव स्वस्थ जीवन व्यतीत कर सकता है, उसी प्रकार वास्तुशास्त्र के सिध्दांतों के अनुसार भवन निर्माण करके प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन को सुखी बना सकता है। चिकित्साशास्त्र में जैसे डाक्टर असाध्य रोग पीड़ित रोगी को उचित औषधि में एवं आपरेशन द्वारा मरने से बचा लेता है उसी प्रकार रोग, तनाव और अशांति देने वाले पहले के बने मकानों को वास्तुशास्त्र के सिध्दांतों के अनुसार ठीक करवा लेने पर मनुष्य जीवन में पुनः आरोग्य, शांति और सम्पन्नता प्राप्त कर सकता है।
प्रकृ्ति द्वारा पाँच आधारभूत तत्वों—-भूमी,जल,अग्नि,वायु और आकाश से ही यह सम्पूर्ण ब्राह्मंड रचा गया है और ये पाँचों पदार्थ ही पंच महाभूत कहे जाते हैं. इन पंच तत्वों के प्रभावों को समझकर,उनका सामंजस्य बनाए रखे हुए,उनके अनुसार अपने भवन के आकार-प्रकार से,मनुष्य अपने जीवन को अधिक सुखी एवं सुविधासम्पन्न बना सकता है. दिशाओं के अनुसार भवनों की स्थिति और विन्यास का उसमें निवास करने वालों के जीवन पर सीधा एवं स्पष्ट प्रभाव पडता है.
सूर्य,चन्द्रादि अन्य ग्रहों तथा तारों आदि का पृ्थ्वी के वातावरण पर क्या प्रभाव पडता है ? अति प्राचीन काल में इसका पर्याप्त अध्ययन-मनन करने के उपरान्त ही अनुभव के आधार पर इस शास्त्र का जन्म हुआ है. सूर्य इस ब्राह्मंड की आत्मा है और उर्जा का मुख्य स्त्रोत. सूर्य और अन्य तारों से प्राप्त उष्मा और प्रकाश,समस्त आकाशीय पिंडों की परस्पर आकर्षण शक्ति,पृ्थ्वी पर उत्पन चुम्बकीय बल क्षेत्र और इस प्रकार के अन्य भौतिक कारकों का पृ्थ्वी की भौतिक दशा,वातावरण और जलवायु पर निश्चित प्रभाव पडता है. और इन सब का अनुकूल,या प्रतिकूल प्रभाव पडता है मानव जीवन पर. अत: वास्तु शास्त्र का ज्योतिष और खगोल से अति निकट सम्बंध है. मनुष्य के रहन-सहन को बहुत हद तक, ज्योतिष और खगोल संबंधी कारक प्रभावित करते हैं. अत: वास्तु शास्त्र के समस्त सिद्धान्त ज्योतिष विद्या पर आधारित हैं. किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य करने से पूर्व इन सब सिद्धान्तों पर भली प्रकार से विचार कर लेना ही मनुष्य के लिए कल्याणकारी है.
जब तक मनुष्य के ग्रह अच्छे रहते हैं वास्तुदोष का दुष्प्रभाव दबा रहता है पर जब उसकी ग्रहदशा निर्बल पड़ने लगती है तो वह वास्तु विरुध्द बने मकान में रहकर अनेक दुःखों, कष्टों, तनाव और रोगों से घिर जाता है। इसके विपरीत यदि मनुष्य वास्तु शास्त्र के अनुसार बने भवन में रहता है तो उसके ग्रह निर्बल होने पर भी उसका जीवन सामान्य ढंग से शांति पूर्ण चलता है।
शास्तेन सर्वस्य लोकस्य परमं सुखम्
चतुवर्ग फलाप्राप्ति सलोकश्च भवेध्युवम्
शिल्पशास्त्र परिज्ञान मृत्योअपि सुजेतांव्रजेत्
परमानन्द जनक देवानामिद मीरितम्
शिल्पं बिना नहि देवानामिद मीरितम्
शिल्पं बिना नहि जगतेषु लोकेषु विद्यते।
जगत् बिना न शिल्पा च वतंते वासवप्रभोः॥
विश्व के प्रथम विद्वान वास्तुविद् विश्वकर्मा के अनुसार शास्त्र सम्मत निर्मित भवन विश्व को सम्पूर्ण सुख, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति कराता है। वास्तु शिल्पशास्त्र का ज्ञान मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कराकर लोक में परमानन्द उत्पन्न करता है, अतः वास्तु शिल्प ज्ञान के बिना निवास करने का संसार में कोई महत्व नहीं है। जगत और वास्तु शिल्पज्ञान परस्पर पर्याय हैं।
क्षिति जल पावक गगन समीरा, पंच रचित अति अघम शरीरा।
मानव शरीर पंचतत्वों से निर्मित है- पृथ्वी, जल आकाश, वायु और अग्नि। मनुष्य जीवन में ये पंचमहाभूत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके सही संतुलन पर ही मनुष्य की बुध्दि का संतुलन एवं आरोग्य निर्भर हैं जिसमें वह अपने जीवन में सही निर्णय लेकर सुखी जीवन व्यतीत करता है। इसी प्रकार निवास स्थान में इन पांच तत्वों का सही संतुलन होने से उसके निवासी मानसिक तनाव से मुक्त रहकर सही ढंग से विचार करके समस्त कार्य सम्पन्न कर पायेंगे और सुखी जीवन जी सकेंगे।
इस ब्रह्माण्ड में अनेक ग्रह हैं किन्तु जीवन केवल पृथ्वी पर ही है, ऐसा क्यों? इसका कारण यही है केवल पृथ्वी पर ही इन पंचमहाभूतों का सही संतुलन है। वर्तमान परिवेश में विश्व के सभी देशों में हिंसा और आतंकवाद का बोलबाला है। प्रतिदिन स्थान-स्थान पर दिन दहाड़े होने वाले अमानुषिक कृत्य, हिंसा, हत्या, लूटपाट, जलाने-मारने की घटनायें मानव को सदैव आतंकित और तानवग्रस्त रखती हैं। मानवीय संवेदनाएं लुप्त हो रही है। ईमानदारी और नैतिकता की बातें व्यक्ति को बुरी लगती है। मूल्यहीनता के वातावरण में मानव में सहयोग, सद्भाव, संवेदना और भाईचारे के स्थान पर असहयोग, अलगाव,र् ईष्या तथा पारस्परिक विद्वेष पनप रहा है। ऐसी स्थिति में हमारे लिए वास्तुशास्त्र ही एक मात्र आधार है जिसका अध्ययन और अनुकरण करके हम विश्व में पुनः शांति स्थापित कर सकते हैं। सच पूछा जाये तो यह तनाव, अशांति एवं अमानवीय कृत्य सम्पूर्ण विश्व में वास्तु सिध्दांतों की अवहेलना करने के कारण ही दिनों-दिन बढ़ते जा रहे हैं।
अपने देश भारत के मानचित्र पर दृष्टिपात करें। भारत के उत्तर में विश्व में सर्वाधिक उच्च पर्वत नगाधिराज हिमालय औरर दक्षिण में नीची भूमि वाला हिन्द महासागर है। इसके आग्नेय, नैऋत्य और पश्चिम में भी जल है परिणामस्वरूप यहां सदैव गृहयुध्द, आक्रमण, विदेशियों द्वारा लूटपाट धन सम्पत्ति का हरण और नाश होता रहा है। दक्षिण में जल होने के कारण यहां की महिलाएं सदैव दुःखी रही है, वे जलने मरने को बाध्य हैं चाहे जौहर के रूप में, सती के रूप में या अब दहेज की बलिदेवी पर।
उन पर सदैव अत्याचार होते रहे हैं। भारत के ईशान और पूर्वी भाग पश्चिम से कुछ नीचे झुके हुए तथा बढ़े हुए होने के कारण ही यह देश अपने आध्यात्म, संस्कृति दर्शन तथा उच्च जीवन मूल्यों एवं धर्म से समस्त विश्व को सदैव प्रभावित करता रहा है। वास्तु का प्रभाव मंदिरों पर भी होता है, विश्व प्रसिध्द तिरूपति बालाजी का मंदिर वास्तु सिध्दांतों का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है, वास्तुशास्त्र की दृष्टि से यह मंदिर शत प्रतिशत सही बना हुआ है।
इसी कारण यह संसार का सबसे धनी एवं ऐश्वर्य सम्पन्न मंदिर है जिसकी मासिक आप करोड़ों रुपये है। यह मंदिर तीन ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ है किन्तु उत्तर और ईशान नीचा है। वहां पुष्करणी नदी है, उत्तर में आकाश गंगा तालाब स्थित है जिसके जल से नित्य भगवान की मूर्ति को स्ान कराया जाता है। मंदिरों पूर्वमुखी है और मूर्ति पश्चिम में पूर्व मुखी रखी गई है।
इसके ठीक विपरीत कोणार्क का सूर्य मंदिर है। अपनी जीवनदायिनी किरणों से समस्त विश्व को ऊर्जा, ताप और तेज प्रदान करने वाले भुवन भास्कर सूर्य के इस प्राचीन अत्यन्त भव्य मंदिर की वह भव्यता, वैभव और समृध्दि अधिक समय तक क्यों नहीं टिक पायीं? इसका कारण वहां पर पाये गये अनेक वास्तु दोष हैं। मुख्यतः मंदिर का निर्माण स्थल अपने चारों ओर के क्षेत्र से नीचा है। मंदिर के भूखण्ड में उत्तरी वायव्य एवं दक्षिणी नैऋत्य बढ़ा हुआ है जिनसे उत्तरी ईशान एवं दक्षिणी आग्नेय छोटे हो गये हैं। रथनुमा आकार के कारण मंदिर का ईशान और आग्नेय कट गये हैं तथा आग्नेय में कुआं है। इसी कारण भव्य और समृध्द होने पर भी इस मंदिर की ख्याति, मान्यता एवं लोकप्रियता नहीं बढ़ सकी।
इसी प्रकार विश्व के मानचित्र पर स्थित सभी देशों को वास्तुशास्त्र के आधार पर परखा जा सकता है और सभी देशों के मुख्य स्थलों को भी, जिनके निरीक्षण, अध्ययन और परखने पर हमें वास्तुशास्त्र के सिध्दांतों की सत्यता और उपयोगिता के दर्शन होते हैं और इसके प्रति हमारा विश्वास और भी दृढ़ हो जाता है।
वायव्य कोण में ही एक अन्य शक्ति छुपी हुई है। इस स्थान में उच्चाटन कीशक्ति है। किसी युवा पढऩे वाले बच्चे को यदि सलेक्शन कराके बाहर भेजना होतो यह स्थान उत्तम है। विवाह के योग्य कन्याएं यहां शयन करें तो शीघ्र विवाहहो सकता है। मैंने बहुत सारे उद्योगों में तैयार माल को यहां रखवाया तो वहशीघ्र ही बिक गया। यह इस बात का प्रमाण है कि पृथ्वी के कण-कण में जीव हैऔर वायव्य कोण में चाहे जीवित व्यक्ति हो, चाहे पदार्थ हो, सबका उच्चाटन होजाता है।
दक्षिण दिशा में तो स्थायित्व की शक्ति है और अगर वहां कोई वस्तु रखी जाएतो वह घर से बाहर ही नहीं निकलती। आप अपने घरों में देख सकते हैं किदक्षिण से दक्षिण पश्चिम के बीच में चाहे काठ-कबाड़ ही हो, बहुत समय तकवहां पड़ा ही रहता है। उत्तर दिशा का अलग चरित्र है। धर्मक्षेत्र है। वहां रखीदवाइयां ज्यादा काम करती हैं। इस स्थान में आमतौर से शांति होती है और जोवहां सोता है उसकी उन्नति होती है।
जनसंख्या के आधिक्य एवं विज्ञान की प्रगति के कारण आज समस्त विश्व में बहुमंजिली इमारतों का निर्माण किया जा रहा है। जनसामान्य वास्तु सिध्दांतों के विरुध्द बने छोटे-छोटे फ्लेट्स में रहने के लिए बाध्य है। कहा जाता है कि इन्हें वास्तुशास्त्र के अनुरूप नहीं बनाया जा सकता।
पर यदि राज्य सरकारें वास्तुशास्त्र के सिध्दांतों के अनुसार कॉलोनी निर्माण करने की ठान ही लें और भूखण्डों को आड़े, तिरछे, तिकाने, छकोने न काटकर सही दिशाओं के अनुरूप वर्गाकार या आयताकार काटें, मार्गों को सीधा निकालें एवं कॉलोनाइजर्स का बाध्य करें कि उन्हें वास्तुशास्त्र के सिध्दांतों का अनुपालन करते हुए ही बहुमंजिली इमारतें तथा अन्य भवन बनाने हैं तो शत-प्रतिशत तो न सही पर साठ प्रतिशत तक तो वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार नगर, कॉलोनी, बस्ती, भवनों, औद्योगिक-व्यापारिक केन्द्रों तथा अन्य का निर्माण किया जा सकता है जिसके फलस्वरूप जन सामान्य सुख, शांति पूर्ण एवं अरोग्यमय, तनाव रहित जीवन व्यतीत कर सकता है।
हमारे प्राचीन साहित्य में वास्तु का अथाह महासागर विद्यमान है। आवश्यकता है केवल खोजी दृष्टि रखने वाले सजग गोताखोर की जो उस विशाल सागर में अवगाहन कर सत्य के माणिक मोती निकाल सके और उस अमृत प्रसाद को समान रूप से जन सामान्य में वितरित कर सुख और समृध्दि का अप्रतिम भण्डार भेंट कर सकें, तभी वास्तुशास्त्र की सही उपयोगिता होगी।
हमारे जीवन में वास्तु का महत्व बहुत ही आवश्यक है। इस विषय में ज्ञान अतिआवश्यक है। वास्तु दोष से व्यक्ति के जीवन में बहुत ही संकट आते हैं। ये समस्याएँ घर की सुख-शांति पर प्रभाव डालती हैं। आप निम्न व्यवसाय स्थल तथा निवास में परिवर्तन कर लाभ उठा सकते हैं।.
हमारी भारतीय हिन्दू संस्कृ्ति अपने आप में एक ऎसी विलक्षण संस्कृ्ति रही है,जिसका प्रत्येक सिद्धान्त ज्ञान-विज्ञान के किसी न किसी विषय से संबंधित हैं और जिसका एक मात्र उदेश्य मनुष्य जीवन का कल्याण करना ही रहा है.मनुष्य का सुगमता एवं शीघ्रता से कल्याण कैसे हो ? इसका जितना गम्भीर विचार भारतीय संस्कृ्ति में किया गया है. उतना अन्यत्र कहीं नहीं मिलता.
वास्तु शास्त्र के अनुसार भवन/मकान इत्यादि निर्मित करने पर कुवास्तुजनित कष्ट तो अवश्य दूर हो जाते हैं,परन्तु प्रारब्धजनित कष्ट तो इन्सान को हर स्थिति में भोगने ही पडते हैं.वास्तु का जीवन में उपयोग मात्र एक कर्म है और इस कर्म की सफलता का आधार वास्तुशास्त्रीय ज्ञान है,जो,एक विज्ञान के साथ-साथ एक धार्मिक विषय भी है. इसलिए वास्तु ज्ञान के साथ-साथ,वास्तु के पूजन और वास्तु के धार्मिक पहलुओं का भी हमें ज्ञान होना चाहिए.
अनुभवहीन और नौसीखीये वास्तु विशेषज्ञों की अज्ञानता के कारण ही आम इंसान वास्तु विषय के प्रति भ्रमित रहता है। जिसके कारण वास्तु विषय की महत्वता कम होती है और जन साधारण का इस विषय के प्रति दृष्टिकोण नकारात्मक हो जाता है। ऐसे अज्ञानियों के चक्कर में पड़कर अपना अमूल्य समय और धन बर्बाद न करें। क्योंकि एक कुशल एवं अनुभवी वास्तु विशेषज्ञ की फीस की तुलना में उसकी सही सलाह से मिलने वाले फायदे बहुत ज्यादा होते हैं।

कुछ जिज्ञासा /जानकारी वास्तु के बारे में..!
वास्तुशास्त्र की उत्पत्ति संभवतः वैदिक काल में हुई। महाभारत, रामायण, मत्स्यपुराण आदि महाकाव्यों में वास्तु का वर्णन मिलता है। इंद्रप्रस्थ का निर्माण वास्तु के नियमों के अनुसार किया गया था; लेकिन एक बड़ी गलती के कारण यह कौरवों के विनाश का साक्षी बना। द्वारका का प्राचीन नगर, जो बाद में डूब गया, वास्तु-आधारित था।वास्तुशास्त्र भारत का अत्यन्त प्राचीन शास्त्र है। वैदिक काल में इसे स्थापत्यवेद की संज्ञा दी गयी। वेदों के प्रति हमारी श्रध्दा और विश्वास आज भी उतने ही दृढ़ हैं जितने पहले थे किन्तु वर्तमान में इस शास्त्र क प्रति संदेह व्यक्त किये जाते हैं जबकि स्थान-स्थान पर खुदाई में प्राप्त प्राचीन बस्तियों के भग्नावेश इस बात के साक्षी हैं कि प्राचीन समय में मंदिर, प्रासाद, बस्तियों एवं नगरों का निर्माण वास्तुशास्त्र के सिध्दांतों के अनुसार ही होता था और इसी कारण लोग अपेक्षाकृत अधिक सुखी थे।
मानव सभ्यता के विकास एवं विज्ञान की उन्नति के साथ भवन निर्माण कला में अनेकानेक परिवर्तन होते गये। जनसंख्या में द्रूतगति से होती वृध्दि और भूखण्डों की सीमित संख्या जनसामान्य की अशिक्षा और वास्तुग्रंथों के संस्कृत में लिखे होने एवं मुद्रण प्रणाली के विकसित न होने के कारण इस शास्त्र की उत्तरोत्तर अवहेलना होगी गयी। विदेशी शासकों के बार-बार हुए आक्रमणों एवं अंग्रेजों के भारत में आगमन के पश्चात् पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण में हम अपने समृध्द ज्ञान के भंडार पर पूर्णरूप से अविश्वास कर इसे कपोल कल्पित, भ्रामक एवं अंधविश्वास समझने लगे।
किन्तु अब जब से विदेशों में हमारे इस शास्त्र को मान्यता प्राप्त हुआ है। जर्मनी, अमेरिका, चीन, जापान आदि देशों में इन ग्रंथों के अनुवाद और सिध्दांतों का अनुपालन आरम्भ हुआ है तो हमने भी इस ओर ध्यान दिया है। किन्तु किसी भी विद्या को पूर्ण और विज्ञान मानने से पूर्व उसे विज्ञान के अनिवार्य पांच तत्वों की कसौटी पर परखना आवश्यक है। ये तत्व है तर्क संगतता और सिध्दान्तता, साध्यता, स्थायित्व, उपयोगिता एवं सर्वग्राह्यता। क्या वास्तु विद्या इस कसौटी पर खरी उतरती है? आइये जाने—
प्रश्न : व्यापार को लेकर परेशान हूं?
– व्यवसायिक प्रतिष्ठान पर बैठते समय आपका मुंह पूर्व या उत्तर की तरफ हो। सदैव गल्ले को दाएं हाथ से खोलें व खुलते समय यह उत्तर की तरफ खुले।
प्रश्न : मानसिक दबाब में रहती हूं व बच्चों की पढ़ाई में रूचि कम है?
– घर के पूर्व-उत्तर कोने में अधिक भारी भरकम समान न रखें, बल्कि इसे साफ व हल्का-फुल्का रखे। कमरों में हल्के रंग का इस्तेमाल करें। पढ़ाई करते समय बच्चों का रुख पूर्व या उत्तर की तरफ हो।
प्रश्न : विदेश जाने में रुकावटें पेश आ रही हैं?
– विदेश जाने के लिए तैयार कागजात, खुद व अन्य सामान के लिए उत्तर-पश्चिम दिशा वाला कमरा इस्तेमाल करें।
प्रश्न : दांपत्तय जीवन सदैव खुशहाल रहे?
– मुख्य शयनकक्ष को दक्षिण पश्चिम में बनाएं। उसमें हल्के गुलाबी रंग का इस्तेमाल करें। अपनी पारिवारिक तस्वीर को पूर्व या फिर उत्तर की तरफ लगाएं।
प्रश्न : वास्तु संबंधी कुछ टिप्स दें जिससे घर में उन्नति आए।
– घर के मुख्य द्वार के अंदर व बाहर दोनों तरफ भगवान गणेश जी का चित्र लगाएं। ऊंचाई वाले वृक्ष दक्षिण व पश्चिम की तरफ लगाएं। पानी के बने तालाब को पूर्व-उत्तर में बनाएं।
प्रश्न : फैक्ट्री शेरमुखी है, साथ लगता प्लाट लेना बेहतर रहेगा या नहीं?
– शेरमुखी प्लाट व्यवसाय के लिए उत्तम है। प्लाट की बढ़ोतरी सदैव पूर्व या उत्तर में लगते प्लाटों में करनी चाहिए। आपके साथ लगता प्लाट उत्तर दिशा में है, इसलिए यह आपके लिए फलदायी रहेगा।
प्रश्न : वास्तु किराये के मकान में रहने पर भी प्रभाव डालता है?
– जी हां। भले आप किराये पर रहें या फिर अपने मकान में वास्तु का संबंध पांच दिशाओं व नवग्रह के साथ है जो हर जगह मौजूद है।
प्रश्न : दुकान पर कारोबार बहुत कम है?
– दुकान पर बना मंदिर गलत दिशा में है। इसे बदलकर पूर्व-उत्तर में बनाएं व कुबेर यंत्र भी स्थापित करें।
प्रश्न : घर में क्लेश रहता है?
– घर के वरिष्ठ सदस्य दक्षिण व पश्चिम वाले कमरों का इस्तेमाल करें। बच्चों को पश्चिम व उत्तर वाले कमरे के प्रयोग के लिए दें।
प्रश्न : घर की महिलाओं में आपसी तनाव रहता है। सास के साथ मतभेद रहता है?
– महिलाओं में मनमुटाव का प्रमुख कारण रसोई घर में आग व पानी का नजदीक होना है। रसोई घर में इन दोनों में फासला बनाएं। खाना तैयार करते समय मुख पूर्व की तरफ हो व पानी की व्यवस्था उत्तर दिशा में हो।
प्रश्न : जब से नई दुकान का नवनिर्माण किया है, कारोबार घटा है व सेहत संबंधी समस्या रहने लगी है?
– पहले आप पूर्व दिशा में बैठते थे, जो सही था। अब आपने अपनी कुर्सी बदल कर दक्षिण की तरफ कर ली है, जो वास्तु दोष है। साथ ही शौचालय से पैदा होती नकारात्मक उर्जा रोकने के लिए इसका निर्माण पश्चिम में करें।
प्र..– ‘वास्तु’ से आप क्या समझते हैं ?
उ.– ‘वास्तु’ शब्द संस्कृत ‘वास’ शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है—निवास करना। यह ‘वास्तु’ और ‘वासना’ शब्दों से भी संबंध रखता है। इसका अभिप्राय है—जीवन को इच्छाओं और वास्तविकता के अनुरूप जीना।
प्र.– क्या आप साधारण शब्दों में बता सकते हैं कि वास्तुशास्त्र क्या है ?
उ.– यह प्रकृति के सिद्धांतों के अनुरूप जीने का प्राचीन विज्ञान है।
प्र.– यह किस हद तक सही है कि वास्तु सिर्फ एक अंधविश्वास है ?
उ.– वास्तु ठोस सिद्धांतो पर आधारित है, जिनका वैज्ञानिक आधार मौजूद है।
प्र. वास्तु का मूल सिद्धांत क्या है
उ.– हमारा शरीर और यह पूरा ब्रह्मांड पाँच तत्त्वों—वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी और आकाश से बना है। इन सभी तत्त्वों का सही दिशाओं में संतुलन बनाए रखना ही वास्तु का सिद्धांत है।
प्र.– क्या वास्तु एक धार्मिक पद्धति है, जो सिर्फ हिंदुओं को प्रभावित करता है ?
उ.– जिस प्रकार सूर्य की ऊर्जा प्रत्येक को लाभ पहुँचाती है उसी प्रकार वास्तु के सिद्धांत सभी मतों के लोगों को प्रभावित करते हैं।
प्र..– क्या इसका धर्म से कोई संबंध है ?
उ.– धर्म जीने की एक राह है और वह हमारे जीने के तरीके के अनुरूप होता है। इस ब्रह्मांड में बहुत सी शक्तियां मौजूद हैं और वे सकारात्मक व नकारात्मक ऊर्जा छोड़ती हैं। वास्तु नकारात्मक शक्तियों का मुकाबला करने और सकारात्मक शक्तियों को ग्रहण करने में मदद करता है।
प्र.– क्या वास्तु का कोई आध्यात्मकि पक्ष भी है ?
उ.– बिलकुल। वास्तु के सिद्धांतों के अनुरूप जीने से शांति प्राप्त होती है, जो हमारी आत्मा और जैव विद्युत क्षेत्र को शक्ति देता है।
प्र.— वास्तु में कितनी दिशाएँ हैं ?
उ.— दिशाएँ सिर्फ वास्तु में नहीं हैं बल्कि वे सूर्य से संबद्ध हैं। ये दिशाएँ हैं—पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, दक्षिण-पूर्व, उत्तर-पश्चिम, उत्तर-पूर्व और दक्षिण-पश्चिम।
प्र.– क्या वेदों में वास्तुशास्त्र का कोई उल्लेख मिलता है ?
उ.— ‘ऋग्वेद’ में इस बात का उल्लेख है कि किसी घर के निर्माण के पहले ‘वास्तु स्पतिदेव’ की पूजा कराई जानी चाहिए। इसमें वास्तु शांति मंत्र भी दिया गया है।
प्र.– वास्तुशास्त्र से संबंधित प्राचीन संबंधित ग्रंथ कौन से हैं ?
उ.— संस्कृत में वास्तुशास्त्र के कई ग्रंथ हैं। इनमें दो प्रमुख हैं—विश्वकर्मा प्रकाश’ और ‘समरंगन सूत्रधार’।
प्र.—. क्या किसी वास्तु—आधारित प्राचीन नगर का कोई प्रमाण मिला है ?
उ.— द्वारका का प्राचीन नगर वास्तु के नियमों के अनुरूप बनाया गया था।
प्र.—-. क्या हमारे धार्मिक ग्रंथों में वास्तु का कोई उल्लेख है ?
उ. —हाँ, मत्स्यपुराण, रामायण और महाभारत में वास्तु का उल्लेख किया गया है।
प्र.— कौरवों के विनाश में वास्तु का क्या योगदान था ?
उ. —इंद्रप्रस्थ के बीचोबीच एक कुआँ खुदवाया गया था, जो वास्तु के सिद्धांतों के बिलकुल विपरीत था।

1 COMMENT

  1. महाराज जी क्या घर के बीचोबीच में पूजा रुम का निर्माण कर सकते हैं।

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